भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बाधा डालना चाहते हैं—और उनकी व्याख्या दूसरे स्वरूपमें करके संसारको भटकाते और उनको धोखा देकर अंधे कुएँमें डालते हैं।

इक्षीसवों प्रकरण

कबीर साहबकी चार-वाणी और चारों वेदोंका वर्णन।

ग्रन्थोंसे यह प्रमाणित होता है कि, जो कबीर साहबकी कोटज्ञानकी वाणी है, उसका नाम ऋग्वेद है, और टकसारज्ञानकी वाणीका नाम यजुर्वेद है, और मूलज्ञानकी वाणीका नाम सामवेद है तथा बीजक ज्ञानकी वाणीका नाम अथर्वण वेद है। ये चारों वेद अत्यंत स्वच्छ थे पर इनमें निरञ्जनने अपना विचार मिला करके इनको दूषित कर दिया अब जब ये दूषित वेद संसारमें प्रचलित हुए तब स्वसंवेदकी शिक्षा इन चारोंसे पृथक् हो गयी और जो —

चार ज्ञान—

कहे गए उनको ऐसा समझना न चाहिये कि, जैसे कबीर बीजक अब जो एक छोटासा ग्रंथ है—इतनाही समस्त बीजक है—सो बात कदापि नहीं। न मालूम कितना बीजक ज्ञान है उसे चुनकर यह बीजक ग्रंथ कबीर साहबने इस कलियुगके मनुष्योंको दिया है। इसी प्रकार उस सत्यगुरुके ज्ञानोंकी वाणियोंकी कोई सीमा तथा अन्त नहीं। बीजक ज्ञानके समुद्रसे एक बूँद निकालकर हम लोगोंको दिया है, सब ज्ञानोंपर अगणित ग्रंथ हैं, उनकी गणना कौन कर सकता है। जब जिस कालमें मनुष्यमें जैसा सामर्थ्य अधिकार तथा बल देखा वैसा प्रदान किया। निदान इस कलियुगके जीवोंमें इतनेही बलको विशेष माना तथा विशेषकी आवश्यकता नहीं देखा। अब इस—

वेदके विषयमें—

यह निवेदन है कि, वेदके ज्ञातागण अपने मनमें सोचे और समझें और ईर्षा तथा द्वेष छोड़कर विचार करें कि, वेदका पिता ओम् है और ओमकी माता कुण्डलिनी शक्ति है। और यह—

कुण्डलिनी

महा माया जो नाभिके नीचे रहती है सो सोंपकी सूरतकी है और उसके मुँहसे संपर्क फूँफकारके सवृश जो शब्द निकलता है, उसीसे मन जीवन पाता है; सो उसकी बही फूँफकार ओँकार है—यह सोंपिनी जो कुण्डल मारकर बँठी है यही मनकी ताजगी तथा जीवन का कारण है—और यह मनही कालपुरुष निरञ्जन है और इसीको बड़ा ब्रह्मा कहते हैं, सो इस मन अर्थात् ॐ की माता कुण्डलिनी