कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 865, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकि, यह कुत्ता तो बातें करता है उसने पूछा कि, तुम कौन हो ? अपना हाल कहो, कुत्ता बोला कि पायखाने हो आ, तब मैं तुमसे कहूँगा । वह महाजन पायखानेसे शीघ्रही पलटकर हाथ पैर धोकर आ बैठा । उस कुत्तेसे पूछा कि, तुम कौन हो ? कुत्तेने कहा तुम कहाँ जाते हो ? महाजनने उत्तर दिया कि, अपने पिताकी गति कराने जाता हूँ । यह बात सुनकर कुत्ता बोला कि, तुम्हारी गया सुफल न होगी । क्योंकि, तुम्हारा पिता तो मैं हूँ । मैंने इस महाजनसे पचास रुपये उधार लिये थे पर ये भूलसे बहीपर न चढ़ा सके, न मैं उनको इसे लौटा सका । उन्हींके बदले मैं इस महाजनके घर कुत्ता हुआ हूँ । यदि तू उसको वे पचास रुपये दे देवे तो मैं इस कुत्तेकी योनिसे छूटूँ, तेरा गया करना सुफल हो । यह बात सुनकर वह मेहमान चुप हो रहा । सबेरा होतेही उसने घरवाले महाजनसे कहा कि, ऐ भाई ! हमारा तुम्हारा लेन देन सदैवसे चला आता है, हमारे पिताने तुमसे पचास रुपये लिये थे, वो अबतक नहीं दिये जासके, उन्हें ले लो । क्योंकि, हिन्दुओंका यह नियम है कि, जो गया करने जाता है वह प्रथम अपना सारा ऋण शोध लेता है तब ही गया सफल होती है, नहीं तो उसका गया करना सुफल नहीं होता । यह बात सुनकर घरवाले महाजनने अपनी बही निकाली । देखी तो कहीं लिखा न पाया । उसने कहा कि, मैं रुपया न लूँगा । उसने बहुत समझाया । कहा कि, यद्यपि तुम्हारी बही पर नहीं चढ़ा पर मुझे भली प्रकार विदित है कि, मेरा पिता तुम्हारे पचास रुपयोंका ऋणी था । पीछे बहुत कहनेसे उसने रुपया ले लिया । उसने अपने मित्रसे विदा होकर गयाकी राह ली । अभी वह दो तीन कोस भी न गया होगा कि, कुत्ता मर गया जिससे वह महाजन बड़ा दुःखी हुआ कि, हमने न जाने कैसा रुपया लिये, जिससे हमारा प्यारा कुत्ता अचानक मर गया ।
कुत्ता और संन्यासी—पञ्जाब देशकी कपूरथला नगरकी एक कहानी है । वहाँ एक राजा था । वहाँ एक तपस्वी संन्यासी भी रहता था । राजा उसकी सेवा किया करता था । उस संन्यासीके पास एक कुत्ता रहता था । एक दिन वह संन्यासी जीवित समाधि लेने लँगा । समाधि लेनेका समस्त प्रबन्ध कर चुकनेके बाद राजाने निवेदन किया कि, ऐ महाराज ? आप तो अब समाधि ले चले, मैंने अनेक कालतक आपकी सेवा की है, आपसे बहुत कुछ आशा रखता था । क्योंकि, मैं निश्चूत हूँ यदि आपकी दया हो तो मेरे कोई सन्तान हो जाय, मैं राज्य धन लेकर क्या करूँ, किसको दूँ ? संन्यासीने उत्तर दिया कि, ऐ राजन् ! तेरे सन्तान नहीं तो मैं स्वयम् तेरा पुत्र होकर उत्पन्न होऊँगा । तेरा पुत्र कहला-