भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आखेट करके मार लेते हैं। यह बहुत चैतन्य रहने पर भी मारा जाता है। रात दिन सचेत रहता है। जब आखेट करनेवाले आते हैं तो हिरनी बच्चोंके समीप रहती है। बच्चोंके प्रेमके मारे भाग नहीं सकती। इसीमें प्रायः शिकार हो जाया करती है। अनेक जातिके हरिण होते हैं।

कस्तूरी मृग—भी इन्हीं हरिणोंमें होता है। उसके प्राणके इच्छुक अनेक मनुष्य होते हैं यह प्रायः चीन देशमें होता है चीनी तवारीखमें लिखा है कि, यह बड़ा सावधान तथा चैतन्य होता है पर्वतोंकी चोटियों पर रहता है, जहाँ कि, मनुष्य तथा पशु कठिनाता पूर्वक पहुँच सकते हों। मनुष्य भेड़िया तथा शेरोंसे बहुत सचेत रहता है यहाँ तक कि, वह अपने मूत्रको भी पी जाता है अपनी मँगनीको धूल मिट्टीमें ऐसा दबा देता है कि, कहीं चिन्ह भी न मिले कोई यह देखकर जानले कि, यहाँ मृग रहता है उसकी नाभीमें मुश्क भरा रहता है। जब कभी भेड़िया अथवा शेर उसका आखेट करनेको उसके समीप पहुँच जाता है कहीं भागनेकी युक्ति नहीं देखता तो ऐसा कार्य करता है कि, अपनी नाभीकी मुश्कको उस शेरकी ओर ऐसे वेगसे चलाता है कि, उस सुगंधसे शेर अथवा भेड़ियेका माथा फट जाता है जिससे वह मर जाता है। उस कस्तूरीकी सुगंध उसके मस्तकको फाड़ डालती है जिससे लहू आने लगता है, वह उसी समय मर जाता है। मनुष्य इस प्रकार उसका आखेट करते है कि, दो मनुष्य पर्वतपर चढ़ जाते हैं एक तो बन्दूक भरकर छिपके बैठ जाता और दूसरा स्वर तालके साथ गाने लगता है। वह जब राग गाने लगता है तो उसके सुननेके लिये मृग शिकारीके समीप आजाता है, राग सुननेमें आत्म विस्मृत कर जाता है। उसी समय बन्दूकधारी छिपा हुआ मनुष्य फँर करता है। गोली लगतेही वह गिरकर तड़पने लगता है। आखेट करनेवाला दौड़कर उसकी कस्तूरीकी थैली काट लेता है। यदि उस थैलीको शीघ्रही न काटे वह मुश्क जो बिलकुल रक्त है समस्त शरीरमें फैल जावे हरिणका मांस कड़वा हो जाये खानेके योग्य न रहे। तथा कस्तूरी भी हाथ न लगे। दूसरी युक्ति यह है कि, जब वह मृग पर्वतके नीचे जल पीने उतरता है तो छिपकर बन्दूकसे मार लेते हैं।

पंचकमें घासका त्याग—भारतवर्षमें लोग इस प्रकार कहते हैं कि, यह मृग प्रायः चींटे और चीटियोंके बिलपर बैठता है। चाहता है कि, चीटियां मुझको काटा करें जिसमें मुझे नींद न आवे मेरी अचेतावस्थामें आखेटकर्ता मुझको मार न ले। यह भी सुना है कि, भद्रा (पंचक) के पांच दिन होते हैं। उन दिनों भारतवासी घास फूसका कुछ काम नहीं करत। पण्डित लोग तो इन दिनोंको