कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 880, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपत्रा देखकर जाना करते हैं पर यह मृग आपसे आप जाना करता है। जब पंचक लगते हैं उसी दिनसे मृग घास नहीं चरता वह मृग पंचकके दोष तथा गुणोंको भली प्रकार जानता है पांच घड़ी घास फूसका बिलकुल काम नहीं करता।
बकरी।
कितनेही मनुष्य बकरियोंको सिखलाते हैं, जिससे वे बड़ेही विचित्र कौतुक दिखाती हैं। इसकी बुद्धि अच्छी होती है। विषैली घासों तथा पौदोंको भली प्रकार पहचानती है, उनको कदापि नहीं खातीं। सुना जाता है कि, बकरियोंमें भविष्यका हाल जाननेकी शक्ति भी होती हैं। क्योंकि, जहाँ कहीं अनेक दिवसोंसे बन्द पड़ा भी कुआँ हो छिप गया हो, यदि उस स्थानको लोग जानने कुर्वेका पता लगाना चाहें तो बकरियोंके झुण्डको उस स्थानपर लेजाके बैठ देते हैं जब सब बकरियां जाती हैं तो छिपे कुर्वेके चारों ओर घेरा बाँधकर बैठ जाती हैं। जहाँ पर वह कुर्वा होता है उस भूमिपर एक भी नहीं बैठती छिपे हुये कूएँ के चौगिर्द बैठती हैं।
कथा सुननेवाली—फीरोजपुर जिलेके लखौके मौजेमें वेदी साहब कथा कहते थे। उसको सुनने अनेक मनुष्य एकत्रित होते थे। एक बकरी भी कथा सुननेको आया करती थी। कथा आरम्भ होनेके पूर्व बकरी आया करती थी। जबतक वह कथा होती तबतक खड़ी होके सुना करती थी। कथा होजानेपर सब लोग चले जाते सबसे पीछे वह बकरी जाया करती थी।
सदनाको उपदेश—सदना नामक एक कसाई था। एक दिन उसके घर एक अतिथि आया। उसने बिचारा कि, यदि बकरा मारूं तो ठीक नहीं उसका अण्डकोष काटलूं तो अतिथिके लिये यथेष्ट होगा। जब वो काटनेको तैयार हुआ तो बकरा बोला कि, ए सदना ! यह बात अच्छी नहीं। कितनी बार तुमने मेरा शिर काटा है मैंने तुम्हारा काटा है। तुम मेरा शिर काट लो अण्डकोष मत काटो। यह बात सुनकर सदना को ज्ञान आगया कसाईका काम छोड़कर परम भक्त हो गया।
भेड़।
भेड़ बकरीकीही एक जाति है। उसकी बुद्धिकी अनेक कहानियां कही जाती हैं। कप्तान ब्राउन साहबका कथन है कि, भेड़ोंको स्वदेशसे बहुत प्रेम होता है।
स्वदेश प्रेम—एक मनुष्यने अपनी भेड़को दूसरेके हाथ बेच दिया। खरीददार भेड़को अपने घर ले गया। वहाँ भेड़को स्वदेश याद आया वह जहाँ