भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 88

ऋषि मुनिके हृदयमें अवश्य होंगे—पर वे ऋषि मुनि कलियुगके मनुष्योंको अब दर्शन नहीं देते। यदि दर्शन देवें तो उनको कोई पहचान नहीं सकता है। वे उन लोगोंको कुछ बतलाते भी नहीं हैं, जो उसके अधिकारी नहीं हैं। वे ऋषि मुनि अबभी पृथ्वी पर हैं कहीं दूर नहीं गये हैं, पर कलियुगके मनुष्य ही उहूँड तथा पापिष्ठी हैं; इस कारण वे उनसे दूर भागते हैं, और अपनेको उन लोगोंपर कदापि प्रगट नहीं करते हैं, यही कारण है कि वर्तमान कालके मनुष्योंसे वे घृणा करते हैं और उनको सुशिक्षित नहीं समझते (मैं यह बात नहीं कह सकता कि, ये प्रचलित वेद—वेद नहीं, अथवा आद्योपान्त अशुद्ध हैं। मेरा कहना केवल यह है कि, इनमें कुछ बातें हैं तथा कुछ नहीं हैं। इस बातके प्रमाणमें एक उदाहरण देता हूँ, और वह यह है—

वेदकी श्रेष्ठतामें दूसरा दृष्टान्त।

“मैंने अपने बाल्यावस्थामें अपने पितासे सुना था कि, राज्य बेतिया में, जो नेपाल राज्यके समीप है, राजाके कुछ मजदूर भूमि खोद रहे थे। जब वे खोदते २ भूभागके विशेष नीचे गये तब उन्हें एक द्वार दिखलायी दिया। उसका समाचार राजाको दिया गया। राजा स्वयम् उस स्थान पर आये और द्वारके खोलनेकी आज्ञा दी। लोगोंने द्वार खोला तो देखाकि, एक कोठरीमें एक मनुष्य आसनमारे बैठा है। उसकी ऊँचाई चौड़ाई मोटाई इतनी अधिक थी कि वह वर्तमान कालका मनुष्य बोध नहीं होता था। उसके शिरके बाल भूमिके चारों ओर चक्रबांधकर छतरीके समान गिरे हुए थे और उसके सामने कपडेसे ढँका हुआ एक कमंडल धरा था। यह दृश्य देखकर राजाको जान पड़ा कि यह कोई ऋषि है, जो अखंड समाधि लगाकर बैठा हुआ है। तब राजाने वेदपाठी पण्डितों को बुलवाया और उनको वेदध्वनि करनेकी आज्ञादी। जब पण्डितोंने वेद पढ़ना आरंभ किया तब, उनकी समाधि खुल गयी और उन्होंने कहा “कौन देदको अशुद्ध पढ़ता है? क्या कलिकाल तो नहीं आ गया कि, वेद अशुद्ध होगये?” तब लोगोंने उत्तर दिया कि, हाँ महाराज! अब कलियुग है इस पर उस ऋषिने कहा कि, यहाँसे गङ्गाजी कितने अन्तर पर हैं। लोगोंने उत्तर दिया कि। साठ कोसके अन्तरपर हैं। फिर उस ऋषिने पूछा कि, गंगा जल कैसा है? लोगोंने कहा कि, जैसे सब जलहैं। तब उसने अपना कमण्डल लोगोंको दिखलाया और कहा कि, जब गंगा इस स्थानपरथी, तबमें ठीक गंगाके किनारे पर बैठाथा और उस समय गंगाजल ऐसा था। इसपर लोगोंने ऋषिजीके कमण्डलका जल देखा, तो वह स्वच्छ दुग्धके भाँति श्वेत था। तब उस ऋषिने कहा कि, अब तुम लोग मेरे पाससे