भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 888

भारतवर्षमें विख्यात है कि, चूहोंको भविष्यका ज्ञान होता है क्योंकि, जिस मकानमें आग लगनेवाली होती है, उससे चूहे पहलेसेही निकल जाते हैं, वह मकान चूहोंसे खाली हो जाता है चूहे कुछ हानि करते हैं उनको गाली देनेसे वे घातक हो जाते हैं अधिक हानि किया करते हैं जो उनकी खुशामद करे तेल आदिका हलवा खिलावे तो कम हानि होती है ।

मैंने सुना था कि, एक गडेरिया भेड़ बकरियां चराता था । उसने एक झाड़ीमें ऐसा कौतुक देखा कि, एक चूहेने बिलसे निकालकर एक काला पैंसा बाहर रख दिया । इस प्रकार कई बार बिलके भीतर गया एक एक पैंसा बाहर लाकर रखता गया । जिससे बहुतसे पैंसोंका ढेर लगा दिया । उसे देखकर चूहा बहुत प्रसन्न हुआ । ढेरके इर्द गिर्द घूमने लगा । फिर उन पैंसोंको बिलके भीतर ले गया, गडेरिया यह कौतुक देख रहा था । उसने जान लिया कि, चूहा उनको बिलके भीतर ले जाना चाहता है वह ललकार कर दौड़ा । चूहा भयके मारे सूराखके भीतर घुस गया । गडेरियेने काले सिक्कोंको उठा लिया उन पैंसोंको भली प्रकार भलकर देखा तो चांदीके रुपये निकले । गडेरिया सांझको भेंड़ोंको लेकर अपने घर आया, सारे मनुष्योंसे चूहेका हाल कहा । गांवके लोग दौड़े आये अधिक द्रव्य प्राप्त करनेके लालचसे बिलको खोदा तो वही एक रुपया मिला जो भीतर लेगया था अधिक कुछ नहीं मिला चूहा भी अपने धनके शोकसे आखिरकार मरही गया ।

सर्प ।

भारतके इतिहासमें सर्पोंकी भी अनेक बातें मिलेंगी रामायण महाभारत भागवत और वेदोंमें सर्पोंकी अनेकों घटनाएं मिलती हैं । पृथ्वीके धारण करने वाले शेषनागसे लेकर भूमिपर फिर फिरकर मूषे खानेवाले तक इस जातिमें आजाते हैं । हिन्दू संस्कृतिमें नाग एक देवयोनि विशेष मानते हैं, इनके लोकको नागलोक कहते हैं इनकी अनेकों जातियां हैं, यहां उन्हींका कुछ वर्णन करते हैं ।

सर्पोंके राजा — यह समाज भी मानव समाजकी तरह ही है जैसे मनुष्योंमें नरपति होते हैं उसी तरह अहिरोंमें भी अहिपति हुआ करते हैं उनके राजाके व्यवहार भी वैसेही हैं वासुकि आदि सर्प जातिके राजेही तो हैं । पर ये तो बड़े राजे हैं, इनके सिवा और भी अनेक छोटे छोटे राजे होते हैं जो भूमण्डलपर भी रहा करते हैं ।

सर्पसभा — सन् १८३५ ई० की एक बात इस प्रकार सुनी गई थी कि, एक ब्राह्मण राजपूताना शङ्खावारीका रहनेवाला था । अकालमें देश छोड़कर दक्षिण हैदराबादको गया, क्योंकि वहाँ उसके यजमान रहते थे । यजमानोंने