कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनन्दजीने वेदकी कहीं भी निन्दा नहीं की है । उलटा वह वेदको लौकिक पार-लौकिक सुखोंका मार्गदर्शक बतलाते हैं । वेदमंत्रोंकी सिद्धिशक्तिको बड़े जोरोंके साथ प्रामाणित करते हैं । समयके फेरसे वेदोंमें गडबड होनेपर शोक प्रगट करते हैं । संसारके सबसे पुराना धर्मग्रन्थ वेदोंकोही मानते हैं । निराकार निरञ्जन परमात्मा परमेश्वरसे उनका प्राकट्य मानते हैं; इतना करनेपरभी अनसमझ लोग उन्हें वेदनिंदक कहते हैं ।
इसके आगे पीछेके प्रकरणोंको अवलोकन करनेसे पाठकोंको स्वतः ज्ञात हो जायगा । फिर इतना होते हुए भी लोगोंको यह लेख खटकते क्यों हैं ?
इसका उत्तर इसके अतिरिक्त दूसरा क्या हो सकता है कि, प्रथम वेदकी इतनी प्रशंसा करके भी स्वामीपरमानन्दजीका लेख दूसरोंको इसलिये खटकता है कि, स्वामी परमानन्दजी जिस मासिक भूमिकापर बैठकर ग्रन्थ लिख रहे हैं. वह साम्प्रदायिक भूमिका है । आप पक्के कबीरपंथी हैं और जिस प्रकार और पंथवाले साम्प्रदायिक दृष्टिसे अपने मतोंको सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैं, उसी प्रकार आपभी अपने पंथ और ग्रन्थोंकी श्रेष्ठता प्रमाणित कर, अपने ग्रन्थोंके पाठकोंकी, कबीर और कबीरपंथकी यथार्थ श्रेष्ठता स्वीकार कराना चाहते हैं । इसलिये जो यथार्थ भी आपके कलमसे निकलता है, वह दूसरे साम्प्रदायिक रंगमें डूबे हुएओंको निन्दासा भासता है । दूसरे जो लोग इसे निन्दा समझते हैं वे भी स्वतः विचार शून्य, सुनी सुनाई बातोंके आधारसे मिथ्या पक्षपात पूर्ण होते हैं । जिन्होंने कभी वेद शास्त्रोंका अवलोकन नहीं किया; बरन अधूरे विद्या और ज्ञानवालोंकी लिखी साम्प्रदायिक पुस्तकोंको पढकर अपना विचार बांध लिया है, जिनमें उदारता और दीर्घ दृष्टिका अभाव और मत मतांतरके मिथ्या विश्वासकाही जमाव है, वे विचारें यदि स्वामी परमानन्दजीके लेखोंपर अविचारी दृष्टि डालकर, उन्हें निन्दक समझ लें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ।
यदि यह ग्रन्थसाम्प्रदायिक ढंगपर न लिखकर साधारण रीति पर लिखा गया होता, तो मेरे विचारसे कभीभी किसीको इसके विषयमें मुँह खोलनेकी हिम्मतही नहीं होती । क्योंकि, वेदके विषयमें स्वामी परमानन्दजीने जो कुछ कबीरमन्शूरमें लिखा है, वह एक प्रकारसे उपनिषद् और गीताके आशयको अपनी भाषामें लिख कर; उसे कबीरपंथी रंगसे रंग दिया है ।
पाठक ! आइये मैं आपको बतलाऊँ कि, किसप्रकारसे स्वामी परमानन्दजीने वेदके विषयमें उपनिषद् और गीताका अनुकरण किया है । पहले स्वामीजीके वाक्योंको देखिये । आप कहते हैं —