भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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वास्तवमें वेदका कोई अंश किसीने लिया कोई अंश किसीने; जैसे यज्ञ इत्यादिका अंश ब्राह्मणोंको मिला, जिसके द्वारा वे अश्वमेध गोमेध इत्यादि यज्ञ करते हैं। वेदका दूसरा अंश जैनियोंको मिला जिसके द्वारा वे दया पालते हैं और सब जीवों की रक्षा करते हैं। वेदका तीसरा अंश मीमांसकोंको मिला जिसके द्वारा वे कर्म कांडको ठीक मानते हैं। वेदका चौथा अंश योगियोंको मिला, जिससे वे लोग योग समाधिको ठीक मानकर उसीसे अपनी मुक्ति जानते हैं। वेदका पाँचवाँ अंश वैरागियोंको मिला, जिससे वे ठाकुरकी उपासनामें लगे। छठे अंशको पाकर वेदान्ती एक अद्वैत ब्रह्मसे लगे। सातवें वेदका एक अंश बौद्धोंको मिला जिससे वे बुद्धके धर्मको ठीक मानते हैं। आठवें वेदकाही एक अंश मूसाइयोंको मिला, जिससे वे अपने धर्ममें लगे। नवें वेदकाही एक अंश ईसाइयोंको मिला कि जिससे वे अपने पथ पर हैं। दसवें वेदका एक अंश मोहम्मदियोंको मिला जिससे वे अपने मजहब पर आरूढ़ हुए।

इस प्रकार जितने ग्रंथ किताब, जो वेदके अनुकूल या प्रतिकूल दिखाई देते हैं अथवा जिसको लोग अबतक जानतेभी नहीं, सो सब वेदकेही अनुसार हैं कारण यह कि वेदके मंत्रोंके अर्थ सब अपने २ बुद्धियानुसार करते हैं और उनसे अपना तात्पर्य निकालकर अपना काम करते हैं। सो यह समस्तधर्म वेदके अनुसार हैं। इन्हीं वेदकी सहायतासे सब मनुष्य अपना २ काम करते हैं। किन्तु काल पुरुषने धोखे तथा दुष्टतासे सबको ऐसा भुला रखा है कि, सबके सब घोर निद्रामें अचेत पड़े हुए हैं, वेदमंत्रोंमें ऐसा रहस्य है कि, उनके यथार्थ तात्पर्यको कोई जान नहीं सकता। सब अपने ढङ्ग पर अर्थ लगाते हैं। एक २ अक्षरके सौसी अर्थ हैं भी; जिससे एक २ मंत्रोंके अनेक अर्थ किये जा सकते हैं। इसी कारण कुछ ठीक अर्थ जान नहीं पड़ता। इसी धोखेमें डालकर कालपुरुषने मनुष्योंको अपने जालमें फँसा मारा।

चौवीसवें प्रकरणसे अनुसन्धान

अनुवादकका भ्रमविमोचनी विवेचन।

कबीरमन्शूरका यह चौवीसवाँ प्रकरण अथवा यों कहिये कि, कबीरमन्शूर के पहले भागका यह पहला अध्याय, साधारण पढ़े लिखे कबीरपंथी और अन्य सम्प्रदायवालोंको बहुत खटकता है। उनका कहना है, इसमें वेदकी निन्दा की गयी है; किन्तु उनका यह विचार केवल भ्रममात्र है। यदि वे इसे विचारपूर्वक पढ़ें और ध्यानपूर्वक इसपर सोचें तो, उन्हें ज्ञात होजायगा कि, स्वामी परमा-