कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 948, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोलता है बाप बाप । पपीहा पुकारता है पी कहां । पी कहें ! ! ! ! काक बोलता है क-क क अर्थात् क-ब्रह्म क अर्थात् विष्णु । एक पक्षी बोलता है मौजूद अल्लाह । एक कहती है या हबीब तू अर्थात् एक तुही है दूसरा नहीं । सतलज नदीके किनारे एक पक्षी कहा करता है “हक्क सुरंह ! हक्क सुरंह” अर्थात् हे ईश्वर ! तुम्हारा भेद किसीने नहीं पाया । एक पक्षी सत्य ! सत्य बोलता है । कागके समान चील भी सुरंह २ बोलता है । इन पक्षियोंकी नाना प्रकारकी बोलीसे उनमें भी मजहब पाया जाता है पुण्यात्मा पापी सब मालूम पड़ते हैं । त्रिखान पक्षी बोलती है या पाकजात, मुर्ग बोलता है सतगुरु तू एक । चिड़ियाको मैंने साफ बोलते सुना है वह काश्मीरके पहाड़में बोलती है, “हे साचे सतगुरु” । पंडुक बोलती हैं हक्क है । कबूतर साँस २ में हक्क २ कहता है ॥
पशु इसी प्रकार भजनमें लीन रहते हैं । पशु और मनुष्यमें कुछ भेद नहीं जिसने पारखके साथ भजन किया वही मनुष्य पदको प्राप्त हुआ । नहीं तो मनुष्यका स्वांग बन जानेसे मनुष्य नहीं हो सकता, मनुष्यता सत्य ज्ञान और पारखका ही नाम मनुष्यता है, जिसमें ये नहीं हों वह कदापि मनुष्य नहीं हो सकता ।
पशु और मनुष्योंमें बराबर ही गुण हैं, केवल तत्त्वोंकी तारतम्यतासे मनुष्य उन्नतिशील बनाया गया है, पशु किसी प्रकारसे उन्नति नहीं कर सकता । महात्माओंने विशेषकर कबीरसाहबने कहा है कि, केवल मनुष्य शरीरमेंही सत्पुरुषकी भक्ति द्वारा मुक्ति पारख प्राप्त हो सकती है । जब तक मनुष्य सत्य पदको प्राप्त कर सत्पुरुषकी भक्ति द्वारा पारख गुरुको पायकर अपने स्वरूपको नहीं पाता, तबतक कीड़े मकोड़े पशु पक्षी और मनुष्यमें कुछ भी भेद नहीं हैं एक आकृति मात्र का भेद है ।
स्थायर और जड़मोंकी एकता—सब जड़ स्थायर जंगम अपने २ परमे-श्वरके भजनमें लगे हुये हैं । यद्यपि स्थावरोंमें भजनका प्रमाण बहुत कम मिलता है । परन्तु सर्वथा ही नहीं मिलता यह नहीं कभी २ पता मिल भी जाता है । जैसा कि, कर्मोंके चिह्नका वर्णन लिखते हुये मैंने चुनार गढ़के रामनामी वृक्षका हाल लिखा है ।
प्रगट हो कि, सर्व स्थायर जंगम जीवधारी अपने ईश्वरका भजन करते हैं सबकी ओर परमात्माकी दृष्टि है । यदि कोई किसी पर अत्याचार करेगा, जिस पर अत्याचार हो वह चाहे वृक्ष हो चाहे मनुष्य, चाहे पशु हो, चाहे पक्षी, चाहे कीड़ा, मकोड़ा हो यहाँ तक कि, यदि जड़ पदार्थोंको भी व्यर्थ नष्ट करेगा