कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 949, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंआवश्यकतासे अधिक उनको बरबाद करेगा तो उस पर परमात्माका कोप होगा उसका बदला देना पड़ेगा ।
जब सब जीवधारियोंकी आत्मा समान हो है इस कारण सब एकही सिद्ध हुये । केवल तत्त्व और गुणोंकी तारतम्यता एवं उलट फेरसे विभिन्नता दिखाई पड़ती है । अपने २ कर्मोंने भिन्न २ रूप रङ्ग कर दिये हैं इससे किसीका क्या अपराध है ? यह सब कर्मोंका दोष है ।
जो भजन करेगा वह बच जायगा नहीं तो काल बली न जाने क्या कौतुक दिखायेगा इस कारण सबको भजन करना चाहिये यही बात इस मुसद्दममें भी कहते हैं ।
अरे तोता भजन बिन खाया गोता । फँसे कपेमें नाहक प्राण खोता ॥
अरे मैना पकड़ जो बाज डैना । न आवे काम तेरी मीठी बैना ॥
अरे तूती पड़ेगी शिरपै जूती । तू सारी रात गाफिल होके सूती ॥
फिरे यम दूत तेरे शर पै लुरका । भजनकरले सजनकबीर गुरुका ॥१॥
अरे बकरा तू क्या अकरा फिरे रे । कभी तलवार गरदन पर फिरेरे ॥
अरे मुर्गा तू क्या बाँगको उठावे । तेरे गल पर छुरी काजी चलावे ॥
अरे मच्छी रसातल घर बनाये । वहाँ भी जालमें धीवर फँसाये ॥
जहां जाल तहांले संगका टरका । भजन करले सजन कबीर गुरुका ॥२॥
अरे चण्डूल कीन्हा घर खजूरी । वहां भी सांप जाके पड़ तूरी ॥
अरे बन मोर क्या भूला तू सोभा । गड़े एक दिन तेरे दिलका खोबा ॥
अरे बुलबुल तू क्या भूला संगयारी । रहेगा चार दिन मौसम बहारी ॥
न जाना भेद तु उस धाम धुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥३॥
फँसेगा फन्दमें फन्दक फसावे । तुझे पिंजरेमें कैदी सो बनावे ॥
न तू रहेगा न यह पिंजरा रहेगा । कहो तू लालसे जा क्या कहेगा ॥
हुये सुमिरन बिना तेलीके बैला । फिरा दिन रात घरही बीच सैला ॥
महाराजा लखो नर नाग सुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥४॥
अरे मूसा तू क्या बिलमें है घूसा । न पावे ठौर जो हैं राम रूसा ॥
पकड़ एक दिन तुझे नोचेगी बिल्ली । करेगी सो तेरी रग सारी दिल्ली ॥
अरे गदहा हुआ बदहा जगतमें । दीन्हा चितको हरिके भगतिमें ॥
परम पुरुष बसैया सन्त उरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥५॥
तू हाथी मांस लादे बेस पाथी । पड़े कुवेंमें भागे सड़ साथी ॥
अरे घोडा पड़ेगा लाख कोडा । जिधर चाहे उधर घर बाग मोडा ॥