कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 950, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरे ऊँटा लदे और नाक नाथा । न छोड़ेगा अब धुनो अपना माथा ॥
शरणले हैं जो साहब तीन पुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥६॥
न विद्या वेद वाणी काम आवे । जवां शिरीं जियादातर फँसावे ॥
हुए बदमस्त विद्या रूप धनके । फिरे हंकारमें मगरूर मनके ॥
नहीं दिलपर जो धीरज रहेगा । तो हजरत वारगहमें क्या कहेगा ॥
हुई पहचान हरसे कालमुरका । भजन करले सजनकबीर गुरुका ॥७॥
तुही गुरु जगतका बन्धन कटैया । तुही सब द्वन्द फन्दाको हरैया ॥
नहीं तुझसा कोई दाया करैया । तु है वैरीको पीरी पै डरैया ॥
जो आजिज अपने पियाको भावकीजै । सो सारे अङ्गमें सो घाव कीजै ॥
उपरसे पीस करदे लोन बुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥८॥
सप्राण स्थावरादि ।
जड़मोंकी तरह स्थावर और जड़ोंमें भी जीव है वे भी जीव विनाके नहीं है, यदि विचारके साथ देखा जाय तो संसारके सभी पदार्थोंमें जीव सत्ता मौजूद है । यदि यह कह दिया जाय की, सारी सृष्टिही जैव है तो कोई अत्युक्ति न होगी । पौर्वत्य, पाश्चात्य, प्राचीन और अधुनिक सभी वैज्ञानिकोंने इस बातको मुक्तकण्ठसे स्वीकार किया है एकही जीव संसारसे स्वावर जड़म जड़ और चैतन्य सब कुछ बन जाता है । यद्यपि यह बात विशेषज्ञोंसे छिपी हुई नहीं है परन्तु आज भी उन व्यक्तियोंकी संख्या अधिक है जिन्हें कि, इन बातोंमें घोर सन्देह है, इसी कारण हम यहाँ यह सिद्ध करना चाहते हैं कि, कोई भी निर्जीव नहीं है । जड़ चेतन ये सभी जीवोंके ही भेद हैं कर्म विपाकोंके अनुसार जीवही सब कुछ बनता चलता है । अब हम कुछ उनको दिखाते हैं जिनमें जीवसत्ता प्रत्यक्ष दीखती हैं ।
तारा और पालपी ।
पालपी मछलीमें प्रत्यक्षरूपसे किसी प्रकारकी जीवित शक्ति जान नहीं पड़ती, न उसके शिर तथा ओखे हैं, न श्वास लेतीही जान पड़ती है, न उसमें रक्त संचालन जान पड़ता है । केवल एक स्वच्छ डला जान पड़ता है, जिसमें थोड़ा प्राण धीरे धीरे चलता जाना जाता है, इसकी अनोखी कहानी है । यदि उसमेंसे एक टुकड़ा तोड़ा अथवा टूट जाय वह उसी जगह पानीमें पड़ा रहे तो वह भी उसी पालपीके स्वरूपका हो जाता है । इस मछलीके शरीरमें अनेक चिन्ह