भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1025, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1025

बोधसागर

( १६७ )

सहस्र अठासी दीप सुधेरा ८८००० । तहाँ सब हँसा करै बसेरा ॥ सब दीपनमाँ शोभा पावैं । वहाँके गए बहुरि नहिं आवैं ॥

गुह्यभेद

एक बात है अन्य नियारी । सोइ मैं धर्मनि कहीं पुकारी ॥ सकल दीप थे दीप निन्यारा । तहवाँ अमरथको दरबारा ॥ कितने कडिहार वा घरकूँ जाई । गुप्त भेद तुम अच्छप छिपाई ॥

छन्द—तहाँ समर्थ आपबिराज है ताका महिमा को लहै । दीपउजियारी कहा बरनौ बास स्वासा सो रहै ॥ आन दीपके हंस हैं सो वाको जाने नहीं ॥ उहाँके वासी हंस सोहेला सो और दीप मानैं नहीं ॥ सदा हजूरी हंस विहँगम जिन देही उन बिसराइया ॥ गुरु शिष्य दोई एक होइकै सो वा दीपसिधाइया ॥

सोरठा—कदली केरे पात, पात पातमें पात है । ऐसे बात बातमें बात, जानेगा जन जोहरी ॥

चौपाई—धर्मदास उवाच

धर्मदास फिरि शीस नवावा । दोउ कर जोरिके विनतीलावा ॥ सोइ हंस रहै पुरुष हजूरी । उनकी रहनि कहौ गुरु थोरी ॥ कैसे रहै वे कैसे बोलैं । कैसे बैठैं वे कैसे डोलैं ॥ कौन ज्ञान कौन है करनी । सो सद्गुरु कहो मोहि बरनी ॥ जगमें रहै कौन सत्य भाऊ । कैसे काया केर सुभाऊ ॥ आन दीप रहै सत्य सुभाऊ । कहो उन्हकी कायाकेर प्रभाऊ ॥ दोउकी परचै मोहि सुनावो । ज्ञान दृष्टि करि मोहि दिखावो ॥

साखी—यह कछु अचरज बात है, कहि दिखावो मोहि । देखो ज्ञान बिचारिके, तबहि हृदय सुख होहि ॥

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 1025, कुल 2136 में से · BharatKosha