कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1036, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६८ )
कर्मबोध
दिखाकर कर्म करवाते हैं इसके उपरान्त स्वर्ग इत्यादि सुख सबका त्याग है । जिस प्रकार पिता रोगी लड़केको लड़ू दिखाकर औषध देता है, उसी प्रकार स्वर्ग तथा वैकुण्ठादिकी लालच मनुष्योंको दिखाई गई है । फिर भी एक कर्म तीन नामोंसे प्रख्यात हुआ संचित-प्रारब्ध-क्रियमाण । सञ्चित उस कर्मको कहते हैं जो रक्षापूर्वक रखा हुआ हो-अर्थात् सहस्रों जन्मसे बराबर उसके साथ लगा चला आता है। ऋण अदा करनेका समय नहीं मिला और वह ऋण माथे चढ़ा रहा । दूसरा प्रारब्ध कर्म वह है जिसे भाग्य कहते हैं । इसी प्रारब्ध कर्म अनुसार मानुषिक शरीर प्रस्तुत हुआ है । अर्थात् अपने पूर्वकर्मानुसार शरीर बना है । जब यह जीव अपने पूर्व शरीरको छोड़ता है तब अहम् बोलता है । अहम् का अर्थ मैं हूँ । अहं बोलकर दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है । चारों खानिके जीवोंकी यही रीति है । जैसे एक प्रकारका कीड़ा होता है । जो वृक्षोंके पत्तोंपर रहता है जब वह एक पत्तेको छोड़कर दूसरेपर जाया चाहता है तब पहले वह अपने अगले पैरोंको पत्तेपर जमा लेता है । जब उसके अगले पैर दूसरे पत्तेपर भली प्रकार जम जाते हैं । तब वह अपने पिछले पैरोंको भी खींचकर दूसरे पत्तेपर जमा लेता है और अगले पत्तेपर भली प्रकार जम कर बैठ जाता है । और पिछले पत्तेसे संबन्ध छोड़ देता है इसी प्रकार सदैव ही इस ( जीव ) का आवागमन हुआ करता है । ब्रह्मासे लेकर सर्वजीवोंमें अहङ्कार भरा हुआ है जिसमें अहङ्कार नहीं उसका आवागमन नहीं अहम् बोलनेसे उसके आवागमन सम्बन्ध बराबर जारी रहता है । वह ब्रह्मा जो पहले अहम् बोला वही ब्रह्मा अनन्त स्वरूप और स्वभावोंमें चारों खानमें समा रहा है । अहम् कर्मोंका आकर्षण है ।