भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १६९ )

जो एक योनिसे स्त्रीचकर दूसरीमें डाल देता है । जैसे चुम्बक लोहेको स्त्रीच लेता है ।

तीसरा क्रियमाण कर्म वह है जो अब कर रहे हैं । यदि यह क्रियमाण कर्म बलवान् होकर शुभ वा अशुभकी ओर झुका तो वह अपना रङ्ग ढङ्ग दिखला देता है । यदि वह सुकर्मकी ओर झुक जावे और सुकर्मकी पूर्णता करले तो वह अपने स्वरूपको प्राप्त करा देता है । यदि अशुभकी ओर झुका तो जड़ योनिमें जा समाता है और नरकके समस्त दुःखों तथा अत्यन्त कष्टोंमें अपनेको डालकर कंकड़ पत्थरकी तरह बेकाम कर देता है, फिर उसको सुपथ नहीं मिलता ।

महाकर्ता-महाभोगी-महात्यागी । महाकर्ता उसको कहते हैं कि, जो कर्म करता है और अपनेको कर्ता नहीं मानता ।

महाभोगी उसको कहते हैं कि, जो सर्व भोग भोगता है और अपनेको भोगता नहीं मानता ।

महात्यागी उसको कहते हैं जो अहंकारको त्याग दे । इस त्यागका गुण तब जाना जाता है जब उसको अन्तर-दृष्टि होती है जबल्लों इन तीनों बातोंका गुण भलीप्रकार जाना न जावे तबल्लों वेद और पुस्तक पाठसे कोई लाभ नहीं होगा । अन्तरदृष्टिसे जाना जाता है कि, यह तीनों क्या बात है ।

महाकर्ता तो यह तब होता है कि जब यह अन्तरदृष्टिसे भली भाँति देखता है, कि मैं कुछ करही नहीं सकता और मैं किसी कार्यका कर्ता नहीं हूँ केवल मैं अपनी मूर्खतावश आपको अपने कार्यका कर्ता समझ रहा हूँ । मैं और यह समस्त संसार कलके सहश चल रहा है । मेरा और किसीका कोई वश ही नहीं कि कोई काम करे । न मालूम वह कौन है जो मुझको तथा समस्तसंसारको

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