भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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मनुष्य अपने कार्योंमें स्वतंत्र हैं इसपर मैंने उत्तर दिया कि यह बात कदापि नहीं, कर्म स्वतंत्रता किसीको प्राप्त नहीं। सब कलके समान गतिमान् हैं। सुतरां तौरीतमें उत्पत्तिकी पुस्तक देखो जब आदम उत्पन्न हुआ। खुदाने उसको मना किया कि तू यह कार्य कदापि न करना और इस वृक्षके फलको न खाना। आदमने न माना और खाया जिससे वह दुर्दशाग्रस्त हुआ। यदि आदम कर्म करनेमें स्वतंत्र होता तो ऐसा कदापि न होता। फिर आदमके पुत्र काबील और हाबील हुए वे भी ऐसे ही थे। कारण यह है कि, दोनोंने एक दिवस परमेश्वरके समक्ष भेंट चढ़ाई छोटे भाईकी भेंट तो स्वीकृत हुई और काबीलकी अस्वीकृत हुई, इस कारण काबील अत्यन्त क्रुद्ध हुआ, तब परमेश्वरने कहा कि ऐ काबील ? तू काहेको कोथ करता है यदि तू अच्छे मनसे देता तो क्या तेरी भेंट स्वीकार न की जाती ? परंतु तू अपने भाईपर जय पावेगा। काबीलने अपने भाईपर जय पाई और उसको मार डाला। जब परमेश्वरने उसको पूछा कि तेरा भाई हाबील कहाँ है। तब उसने उत्तर दिया कि मैं नहीं जानता क्या मैं अपने भाईका रखवाला हूँ। इस पर खुदाने उत्तर दिया कि तेरे भाईका खून मुझे पुकारता है। अब तू हत्यारा तथा दोषी हुआ यह कहकर खुदाने उसको शाप दिया। भलाजी ! यह न्यायकी बात थी कि खुदाने तो स्वयम् कहा कि तू अपने भाईपर जय पावेगा उससे जय पाई और उसको मार डाला। फिर वह दोषी कैसे ठहरा ? यदि अपने भाईको न मारता तो खुदा झूठा होता और मारा तो दोषी हुआ और वह हजूरसे दूर किया गया तथा उसकी सन्तान पापिष्टी ठहरी।