भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कर्मबोध

ऐसा ही त्रहके विषयमें जानना चाहिये कि त्रह सिखाते-सिखाते विवश हो गया, किसीने उसका कहना न माना अन्तको बाढ़ आई और समस्त मनुष्य डूब मरे। कोई जीव सिवा उनके कि जो त्रहकी नावपर था नहीं बचा। फिर त्रहकी शिक्षा तथा खुदा की चौकसी किसी कामकी आयी। वह भी कर्ममें स्वतंत्र ठहरा जब बाढ़से सबको सत्यानाश कर चुका और त्रहकी ओर खुदाने ध्यान दिया तब खेद करने और पछ्ताने लगा कि मैंने सबको बाढ़से क्यों नष्ट किया। कारण यह कि मनुष्यों के ध्यान तो बचपनसे ही बुरे हैं अब भविष्यमें मैं बाढ़से लोगोंको न मिटाऊँगा। इससे प्रमाणित हुआ कि इस खुदाको भी स्वतंत्रकार्याधिकार प्राप्त नहीं यदि ऐसा होता तो जब वह आदमका पुतला बनाने लगा फिरिश्तोंने मना किया कि आदमका पुतला न बनाओ वे पाप करेंगे फिर पृथ्वी रोई और कहा कि मुझसे मिट्टी मत लो और मनुष्यका पुतला न बनाओ, मनुष्य बड़ा पाप करेंगे पर खुदा साहबने किसीका कहना न माना। अपनी इच्छासे मनुष्यका पुतला बनाया। आगे मनुष्योंके पापोंसे रुष्ट होकर बाढ़ लाकर पछताया आगे फिर मैं कैसे कहूँ कि खुदा साहबको कार्यस्वतंत्रता प्राप्त थी।

हजरत त्रहकी उपरांत हजरत इबराहीम अच्छे और पवित्र-खुदा के पैगम्बर हुए। वे भी स्वतंत्र नहीं थे कारण यह कि उनकी शिक्षासे नमरुद बादशाह इत्यादि सभी विरुद्ध होगये।

इबराहीमके उपरांत इसहाकको पैगम्बरी मिली और इसहाककी स्त्री रबका जब गर्भवती हुई उसके पेटमें दो बालक थे और वे दोनों पेटके भीतर परस्पर लड़ते थे-तब रबकाने खुदाके निकट जाकर निवेदन किया कि मेरे पेटके दोनों लड़के आपसमें क्यों

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