भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कर्मबोध

बन्धनमें रहे बाहरसे तो उन्होंने सब छोड़ दिया, पर भीतरसे छोड़ नहीं सके और न देह अभिमान छूटा । देहका अभिमान छूटा तब जाने कि जब किसी प्रकारकी आपत्ति तथा साहसकी घटनासंघटित हो तब स्थिरता न छूटे और न किसी प्रकारकी चबड़ाहट हो । सुतरां ऋषिमुनिगण उजाड़ तथा वनमें बसते हैं । उनको वहां प्रत्येक प्रकारकी आपत्तियां आ घेरती हैं । शोर, सांप, भेड़िया, रीछ और कानखजूरे इत्यादि नाना-प्रकारकी आपत्तियां दिखाई देती हैं । इस स्थानपर साधु अपने मन को बहुतही दृढ़ रखते हैं । कोई हिंसकजीव फाड़कर खाजावे तो तनिक भी न समझते कि यह मेरी देहहै । सब तपस्वियोंकी ऐसीही अवस्था होती है । जब भीतरी अथवा बाहरी उनको अपनी शरीरकी ओर ध्यान हुआ तब उनका त्याग कुछ नहीं सुतरां सर्वे त्यागियोंमें बड़े त्यागी शुक्रदेवजी थे कि मायाके भय से बारह वर्ष पर्य्यन्त माताके गर्भमें थे । जब बाहर निकले तब उनको त्याग और वैराग्य रहा । उनका हाल बहुतप्रसिद्ध है जब राजा जनकके समीप गये तब उन्होंने एककोतुक दिखाया कि उनके समस्त नगरमें आग लगी और सब कुछ जलने लगा । राजा जनक निर्भय बैठे रहे और शुक्रदेवजी अपनी तूंबी लँगोटी लेने को दौड़े । तब राजाने कहा कि बैठ, किधर जाता है ? तू तो आपको बड़ा त्यागी समझता है अब लँगोटी और तूंबी लेने दौड़ा । मेरे राज्यका समस्त सामान जल रहा है और मैं तनिक भी अधीर नहीं हुआ । तू कैसा त्यागी है । तुझे तो लँगोटी और तूंबीकी चिन्ता लगी है जिसको तूंबी लँगोटीकी चिन्ता नहीं छूटी उसको देहका अभिमान कैसा छूट जावे ? अतः जबलें देहका अभिमान न छूटे तबलें महात्यागी कैसे हुआ, यह सब

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