कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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उनके मनमें बड़ा भय समाया और वह साधुके पास जाकर उससे क्षमा प्रार्थना करने लगा ।
एक साधुको एक गृहस्थ ने खीर खिलाई और चीनीके बदले भूलसे नमक डाल दिया । कारण यह कि, वह नमक चीनीके सहसा था। वह साधु बिना कुछ कहे खा गया उसके भीतर जब नमककी आग लगी तब उस गृहस्थके घरमें आगलगी जब घरमें देखने लगे तब जान पड़ा कि साधुको चीनीके भ्रमसे नमक दे दिया गया । लोगोंने कहा कि, उस साधुके हृदयमें ठण्ठक आवे तब घर की आग भी बुझे। थलीमें कोई सरदार था उसके पास एक वैष्णव साधु आया और उसने नहा थोकर ठाकुरजी की पूजा की । उस समय उस सरदारने दूध और चीनी साधुके निमित्त मँगवा दी, उस वैष्णवने ठाकुरजीको भोग लगाया । इसके उपरांत जब आप वह दूध पीने लगा तब उस सरदारको याद आया कि, जहाँ चीनी थी वहाँ घोड़ेकी दवाईके लिये संखिया भी पीसा था ऐसा न हो कि साधुको संखिया दिया गया हो दौड़के देखा तो संखिया दिया गया था । उस सरदारने पुकारके कहा महाराज ! यह दूध मत पीओ इसमें संखिया पड़ गया । तब उस वैष्णवने कहा कि अब तो यह संखिया ठाकुरके भोग लगाया जानुका है मेरे ठाकुर संखिया पीवें और मैं चीनी पीऊँ ? वह वैष्णव दूध तथा संखिया सब कुछ पीगया और चंगारहा संखियाने उसको किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँचाई । उसके भीतर भोगता विष्णु था विष्णु उसको देखता था और वह विष्णुको देखता था । आप उस भोगसे अलग रहा ।
तिसरे महात्यागी-तब होता है जब देहके अभिमानको छोड़े जबलों देहका अभिमान न छूटे तबलों त्यागी नहीं । अभिमानही करके यह देह मिलती है और इसीसे स्थित हो रही है । सहस्रों त्यागी हो गये परन्तु देहका अभिमान न छोड़ने से