कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कर्मबोध
जैसा कुल कार्य यह मनुष्य जाग्रत अवस्थामें करता है वैसेही कार्य स्वप्नावस्थामें किया करता है। परन्तु स्वप्नावस्थाके कर्मोंको कोई नहीं कहता कि मैंने किया। यद्यपि जाग्रत अवस्थाके कर्मोंका कर्ता यह स्वयम् बनता है कि यह कर्म मेरे हैं, यद्यपि जाग्रत तथा स्वप्नावस्था दोनों समान हैं। केवल उतनी ही विभिन्नता है कि, जाग्रत देरलों उसके साथ रहती है और स्वप्न थोड़ी देरमें बीत जाता है। यदि स्वप्नके कर्म उसके नहीं तो जाग्रतके कर्म भी उसके नहीं, इस कारण आपको स्वकर्ममें स्वतन्त्र समझना अज्ञानता है। यह स्वतन्त्र कदापि नहीं। ज्ञान की दृष्टिसे यह अहंकार जाता रहता है। इस जीवकी चारों दशा स्वप्नके समान हैं।
दूसरे महाभोगी वह है कि जो समस्त भोगोंको भोगता है और आपको भोगनेवाला नहीं मानता। यह भी बिना अन्तरप्रकाशके जाना नहीं जा सकता कि, भोगनेवाला कौन है और मैं कौन हूँ। यदि मैं भोगनेवाला होता तो मैं जो चाहता सो भोग भोग लेते और भोगोंसे कभी न भागता। कोई भोग ऐसा नहीं है कि जो भोगोंसे अलग जानता है उसके सामने अच्छा और बुरासमस्त भोग समान हैं कारण यह है कि, जब रानी द्रौपदीने श्वपच सुदर्शनके सामने भांति भांतिके स्वादिष्ठ भोजनोंके थाल धरे तब उन्होंने सब खट्टा मीठा और नमकीन एकमे मिलाकर खाना आरम्भ किया। कारण यह कि उनको स्वादोंकी कामना नहीं थी एक साधुको एक मनुष्यने कड़ई तुम्बेकी तरकारी बनाकर खिला दिया। वह साधु कड़ई तरकारी बिना कुछ कहे सुने खा गया जब पीछे गृहस्वामी खाने लगा तब उसको वह तरकारी विषसम मालूम हुई। वह अपनी स्त्रीको डाटने लगा कि तूने यह विषसमान तरकारी साधूको खिला दी साधूको कितना दुःख हुआ होगा।