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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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उनके मनमें बड़ा भय समाया और वह साधुके पास जाकर उससे क्षमा प्रार्थना करने लगा ।

एक साधुको एक गृहस्थ ने खीर खिलाई और चीनीके बदले भूलसे नमक डाल दिया । कारण यह कि, वह नमक चीनीके सहसा था। वह साधु बिना कुछ कहे खा गया उसके भीतर जब नमककी आग लगी तब उस गृहस्थके घरमें आगलगी जब घरमें देखने लगे तब जान पड़ा कि साधुको चीनीके भ्रमसे नमक दे दिया गया । लोगोंने कहा कि, उस साधुके हृदयमें ठण्ठक आवे तब घर की आग भी बुझे। थलीमें कोई सरदार था उसके पास एक वैष्णव साधु आया और उसने नहा थोकर ठाकुरजी की पूजा की । उस समय उस सरदारने दूध और चीनी साधुके निमित्त मँगवा दी, उस वैष्णवने ठाकुरजीको भोग लगाया । इसके उपरांत जब आप वह दूध पीने लगा तब उस सरदारको याद आया कि, जहाँ चीनी थी वहाँ घोड़ेकी दवाईके लिये संखिया भी पीसा था ऐसा न हो कि साधुको संखिया दिया गया हो दौड़के देखा तो संखिया दिया गया था । उस सरदारने पुकारके कहा महाराज ! यह दूध मत पीओ इसमें संखिया पड़ गया । तब उस वैष्णवने कहा कि अब तो यह संखिया ठाकुरके भोग लगाया जानुका है मेरे ठाकुर संखिया पीवें और मैं चीनी पीऊँ ? वह वैष्णव दूध तथा संखिया सब कुछ पीगया और चंगारहा संखियाने उसको किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँचाई । उसके भीतर भोगता विष्णु था विष्णु उसको देखता था और वह विष्णुको देखता था । आप उस भोगसे अलग रहा ।

तिसरे महात्यागी-तब होता है जब देहके अभिमानको छोड़े जबलों देहका अभिमान न छूटे तबलों त्यागी नहीं । अभिमानही करके यह देह मिलती है और इसीसे स्थित हो रही है । सहस्रों त्यागी हो गये परन्तु देहका अभिमान न छोड़ने से

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कर्मबोध

बन्धनमें रहे बाहरसे तो उन्होंने सब छोड़ दिया, पर भीतरसे छोड़ नहीं सके और न देह अभिमान छूटा । देहका अभिमान छूटा तब जाने कि जब किसी प्रकारकी आपत्ति तथा साहसकी घटनासंघटित हो तब स्थिरता न छूटे और न किसी प्रकारकी चबड़ाहट हो । सुतरां ऋषिमुनिगण उजाड़ तथा वनमें बसते हैं । उनको वहां प्रत्येक प्रकारकी आपत्तियां आ घेरती हैं । शोर, सांप, भेड़िया, रीछ और कानखजूरे इत्यादि नाना-प्रकारकी आपत्तियां दिखाई देती हैं । इस स्थानपर साधु अपने मन को बहुतही दृढ़ रखते हैं । कोई हिंसकजीव फाड़कर खाजावे तो तनिक भी न समझते कि यह मेरी देहहै । सब तपस्वियोंकी ऐसीही अवस्था होती है । जब भीतरी अथवा बाहरी उनको अपनी शरीरकी ओर ध्यान हुआ तब उनका त्याग कुछ नहीं सुतरां सर्वे त्यागियोंमें बड़े त्यागी शुक्रदेवजी थे कि मायाके भय से बारह वर्ष पर्य्यन्त माताके गर्भमें थे । जब बाहर निकले तब उनको त्याग और वैराग्य रहा । उनका हाल बहुतप्रसिद्ध है जब राजा जनकके समीप गये तब उन्होंने एककोतुक दिखाया कि उनके समस्त नगरमें आग लगी और सब कुछ जलने लगा । राजा जनक निर्भय बैठे रहे और शुक्रदेवजी अपनी तूंबी लँगोटी लेने को दौड़े । तब राजाने कहा कि बैठ, किधर जाता है ? तू तो आपको बड़ा त्यागी समझता है अब लँगोटी और तूंबी लेने दौड़ा । मेरे राज्यका समस्त सामान जल रहा है और मैं तनिक भी अधीर नहीं हुआ । तू कैसा त्यागी है । तुझे तो लँगोटी और तूंबीकी चिन्ता लगी है जिसको तूंबी लँगोटीकी चिन्ता नहीं छूटी उसको देहका अभिमान कैसा छूट जावे ? अतः जबलें देहका अभिमान न छूटे तबलें महात्यागी कैसे हुआ, यह सब

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प्रशंसा तथा गुण कबीर साहबके हैं और दूसरेके नहीं बनारसमें कैसे २ कष्ट मिले परंतु उनका तनिक भी ध्यान नहीं किया औरन मनमें कुछ कष्टमाना महात्याग इसीका नाम है। सहस्रों साधुसन्तोंने अपनेको ईश्वरमें लीन कर दिया तो भी देहका अभिमान और वासना उनके मनमें रही, इस कारण उनका भगवतमें लीन होनाभी काम न आया। जो लोग सत्यगुरुको पहुँचानकर भगवतमें लीन होते हैं वे धन्य हैं। उन्हींका भगवतमें लीन होना सफल है।

वेद तीन भागोंमें विभक्त हुआ—कर्म-उपासना-ज्ञान। कर्मोंमें दो भाग हुए एक तो यज्ञ इत्यादि जो सांसारिक अर्थोंके निमित्त करते हैं। दूसरा योग जो अपनी मुक्तिके निमित्त करते हैं। इन कर्मों द्वारा सांसारिक तथा पारलौकिक अभिप्राय सिद्ध होते हैं जिनके जैसे पाप पुण्य होते हैं वैसी ही अवस्थामें वे जाते हैं और वैसा ही उनको भोग मिलता है।

दूसरी उपासना है—सांसारिक लोग उपासना करते हैं और उपासनाके निमित्त विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, चण्डी, सूर्य और गणेश आदि देवता ठहराये हैं।

तीसरा ज्ञान-इसकी सात भूमिका हैं और यह सब स्वप्नवत् हैं। इनमें समस्त युक्तियों द्वारा किसीका छुटकारा नहीं हो सकता। इनमें पारखपदकी कुछ सुध नहीं। अतः ये समस्त कर्मकाण्डी और ज्ञानी अपनी अपनी सीमाको पहुँच जाते हैं। तो भी उनको छुटकारेकी राह नहीं मिलती। बिना पारख गुरुके अन्धोंकी तरह टटोलते फिरते हैं। परंतु वे राह नहीं पाते। क्या युक्ति करें कोई तदबीर नहीं सूझती, तब विवश होकर बैठे रहते हैं। जो जो तदबीरें वेदने बताई उनसे तो कुछ काम न

नं. ७ कबीरसागर - ७

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कर्मबोध

हुआ और अब दूसरा उपाय कहाँ पावें, क्या करें । जो कुछ ज्ञान मिला उसीपर सन्तोष कर बैठे आगे कोई पथ वेदों तथा पुस्तकों द्वारा नहीं मिला, किसे पूछे और किसके घर जावें ।

मीमांसक और जैन कर्महीको मुक्तिमार्ग समझते हैं । परन्तु यह नहीं जानते कि, यह कर्म कहाँसे उत्पन्न हुआ है और कहाँ तक पहुँचा सकता है । यह विधि निषेध दोनों शाखा निर-अन निर्मित है । वहाँ ही तक पहुँचानेका सामर्थ्य रखते हैं । इन कर्मों द्वारा स्वर्ग तथा नरक सब कुछ प्राप्त होता है । जहाँलोग कर्मोंकी पहुँच है वहीलोग कालपुरुष हस्तक्षेप करता है । कर्मोंका सुविशाल वन है उसमें यह जीव भूलकर अपने घर-से बाहर हो गया है वनहिंसक जन्तुओंसे भरा हुआ है और सूर्य चन्द्र सितारे इत्यादि तनिक भी दिखाई नहीं देते । न कोई सड़क और न पगडण्डी है जो पगडण्डी कहीं है, सो पशुओंकी है मनुष्यकी नहीं । इस कारण इन कर्मोंके वनसे कोई बाहर हो नहीं सकता । कर्म करता है और फिर फिर कर्म करनेके लिये बारम्बार देह धारण करता है । इसको कुछ पता नहीं लगता कि वह कौन कर्म है जिससे मेरे कर्मका बन्धन कटे । वह कर्म जिससे इसका बन्धन कटे केवल स्वसंवेदकी शिक्षा है, उससे तो यह जीव अज्ञान है । इन्हीं कर्मोंकरके समस्त योनि ठहराई हैं जैनी जिनका समस्त ध्यान कर्मोंपर है वे आठ प्रकारके कर्म कहते हैं, वे ये हैं:-

१-ज्ञानवर्णी कर्म । २-दशनावर्णी कर्म । ३-वेदनी कर्म । ४-मोहिनी कर्म । ५-नाम कर्म । ६-आयु कर्म । ७-गोता कर्म । ८-अन्तराय कर्म ।

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अब इन आठों कर्मोंका सुविस्तृत विवरण सुनो । आवरण नाम ढक्कनका है । १ ज्ञानवर्णी कर्म अर्थात् ज्ञानका ढांकनेवाला कर्म इसके कारण ज्ञान नहीं होने पाता, यह ज्ञानके ऊपर परदा डाल देता है । इसके कारण ज्ञान जो उत्पन्न होने नहीं पाता सो ज्ञान पांच प्रकारका है ।

१-मतिज्ञान । २-श्रुतिज्ञान । ३-अवधिज्ञान । ४-मनप्रजय-ज्ञान । ५-केवल ज्ञान ।

मति ज्ञान-मति नाम बुद्धिका है अर्थात् वह ज्ञान जो बुद्धि तथा सोचसे सम्बन्ध रखता है । इस मति ज्ञानमें समस्त संसार की हुनर तथा कारीगरियां संयुक्त हैं । जिसको मतिज्ञान होता है वह कारीगरी और शिल्पकारीमें बड़ा चैतन्य रहता है । जिस किसीको मतिज्ञान आवर्णी कर्म उगता है-उसको गुणोंका पांडित्य प्राप्त नहीं होता ।

दूसरा श्रुतिज्ञान है-श्रुतिज्ञान समस्त शास्त्रोंके कण्ठस्थ करनेको कहते हैं कुछ कागज तथा ग्रन्थ इत्यादि देखनेकी आवश्यकता न हो सब बातें हृदयमें रहें । शास्त्रद्वारा तीनों कालोंकी बातोंको जानता हो उसको श्रुति केवली अथवा श्रुतिज्ञानी कहते हैं । इस श्रुतिज्ञान को जो कर्म रोकले और न होने दे उसका श्रुतिज्ञान आवर्णी कर्म नाम है ।

तीसरा अवधिज्ञान है-अवधिज्ञान उसको कहते हैं जिसके द्वारा लोग मनुष्योंके मनकी बातको जान लेते हैं । समस्त गुप्त बातोंको बतलाते हैं और अन्तर्यामी कहलाते हैं, जो कर्म इस अवधि ज्ञानपर परदा डाले और होने न दे उसको अवधिज्ञानवर्णी कहते हैं ।

चौथा मन प्रजय ज्ञान है-मनप्रजय ज्ञान उसको कहते हैं कि जो हृदयकी गतिको जाने । अर्थात् जहां हृदय दौड़े वह सब कुछ

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मालूम करले हृदयकी समस्त चाल तथा स्थिरताको बूझ ले जो कोई इस प्रकारकी विद्या रखता हो उसको मन प्रजयज्ञानी जानते हैं। मन प्रजय ज्ञानमें यह गुण है कि, जब जिसको यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है फिर कभी नहीं जाता। मन प्रजयज्ञानी अवश्य-ही केवल ज्ञानका अधिकारी हो जाता है, पूर्वके तीन ज्ञानोंमें तो संदेह रहता है क्योंकि वे होते हैं और जाते भी रहते हैं परंतु मन प्रजयको स्थिरता तथा स्थिति है, मनप्रजय ज्ञान अवधिज्ञानसे बहुत बढ़के है। जो कर्म इस मनप्रजय ज्ञानको छिपा लेता है और नहीं होने देता उसको मनप्रजय आवर्णी कर्म कहते हैं।

पांचवां केवलज्ञान है—यह सबसे बढ़कर है। यह समस्त-ज्ञानोंका राजा है। जैनी ऐसा मानते हैं कि इस केवल ज्ञानसे कोई बात छिपी नहीं रहती। सबसे उच्च श्रेणी ज्ञानकी यही है। जैनके चौबीस तीर्थंकर सब केवल ज्ञानी होते हैं उनके अतिरिक्त और कितने दूसरे साधू भी केवल ज्ञान रखते हैं। इस केवल ज्ञानको जो छिपाये रखे और न प्रकाशित होने दे उसका नाम केवल ज्ञानवर्णी कर्म है। दूसरा दशनावर्णी कर्म है—जिसके कारण प्रत्यक्षमें दर्शन नहीं होता और उसके परदेमें अलख करतार रहता है। उसकी चार शाखायें हैं।

तीसरा वेदनी कर्म है—जिसके कारण जीवको दुःख सुख होता है। उसकी दो शाखायें हैं।

चौथा मोहिनी कर्म है—उसकी दो शाखायें हैं।

पांचवां आयु कर्म है—इससे आपदाका अन्दाजा होता है और इसकी चार शाखायें हैं।

छठवें नाम कर्म है—इसकी तिरानवे शाखायें हैं। यह नाम कर्म जीव धारियोंकी मूर्ति और स्वरूप बनाता है।

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सातवां गोटकर्म है—इस गोट कर्मकी शास्त्रायें हैं। एकसे नीची जगह और दूसरी ऊँची जगह जीव देह धरकर उत्पन्न होता है आठवां अन्तराय कर्म है—उसकी दो शास्त्रायें हैं। इस अन्तराय कर्म का यह काम है कि जो ज्ञान होनेवाला हो उसको होने दे उसमें विभिन्नता डाल दे आठों कामोंका विवरण मैं ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें लिख आया हूँ जो चाहे सो देखले। इन्हीं आठकर्मों से समस्त जीव चार खानि चौरासी लाख योनियें आवागमन किया करते हैं। कर्मोंपासना और ज्ञान भी सविस्तर रूपसे वहीँ लिखा है जिससे स्पष्ट प्रगट होता है कि इस जीवका आवागमन कैसे सुकर्म तथा कुकर्मोंसे हुआ करता है। यह समस्तकर्म तो भ्रमरूप हैं। इनसे कदापि छुटकारा नहीं होता। जिसको वेद धर्मके लोक और जैनी केवल ज्ञान कहते हैं सौ केवल ज्ञान शुद्ध नहीं है इसमें अन्धकार है इस कारण इन केवल ज्ञानियोंको स्वच्छ प्रकाश नहीं है, जिससे वे लोग मुक्तिकी सुधि नहीं रखते हैं, जीवके कर्म ही उसका स्वरूप बनाते हैं। कर्मोंसे ही इस जीवका आवागमन चारों खानियें बराबर बना रहता है। सत्यगुरु भेद बतलावे तो आवागमन सम्बन्ध टूटे।

मुसहद

तू है करतार किब्रिया बारी। तेरा है हुकम सब जगह जारी। तेरी तसबीर सुबुक और भारी। नकशहा सब शिगरफोजंगारी आलमोंका है सारे काम तुम्हें। ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही इनसान हुआ तूही हैवान। तूही रहबर हुआ तूही शैतान॥ जिस्म सदहाव एकही हैं जान। होवे क्योकरबयां तुहारी शान॥

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कर्मबोध

लोक तीनों दिया इनाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

मालिक व आदमवजित्रनो परी । हवशी हिन्दीवखबर औरतरी ॥ रंगबिरंग ढंग चार खान करे । अदलो इनसाफ साफसाफ करे ॥

दिया आलमका इन्तजाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

बन्दः साहब कहीं किया है जुदा । कहीं बन बैठे आप आद खुदा ॥ सारे आलममें तेरी सूतोसदा । तुझेसे सारे शरी शाहो गदा ॥

सिजदा करते हैं खासो आम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही वाचून और तुही बचून । सूरत सूत्र तुझीने गूनागून ॥ तूही मकबूल औ तूही मलऊन । तूही खुद रमरहा है सारंजून

दे जमीनों जमा तआम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही जेरीन दरमयां बाला । मनका मनका हुआ तुही माला ॥ तूही पैदा किया तूही पाला । तूही सबजा हुआ तुही जाला ॥

कौन पहचान अकल खाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

इन्द्र ब्रह्म व विष्णु भी भूले । अपने अमलोंके झोकमें झूले ॥ कहीं पजपुरदा और कहीं फूले । हिसं हवां घर बघर डोले ॥

दे रहीमो करीम नाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

आशकोंको दिखाया राहे सवाब । फासिकोंके लिये सहीद अजाब

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साराअलम बना खयालोख्वाब । कोई नदेरी ना सारने कशबरआब

सारे जान्दार दे गुलाम तुम्हें ।

ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥

सारे जान्दारको फँसा मारा । नहीं इस जीवका रहा चारा ॥ करके तदबीर तुमसे सब हारा । जिन्दाकरकरके फिर फिर मारा॥

दे मुकद्दर बदस्त दाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही बखसिन्दा हैअपनो अमाँ । मातहत तेरे सब हैंजिसमो जाँ॥ तुझसे पैदा है वाणीवदो कुराँ । अबिदानो जादिदाने जमाँ ॥

याद करते हैं सुबहौं शाम तुम्हें ।

ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥

सारे मजहब जहाँमें जारी है । पीर सुरशिदकी राहदारी है ॥ अर्शफ़शोंकी सब तयारी है । आजिज इसरारसे सब आरी है॥ पेशवा भी किये इनाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सदसलाम तुम्हें॥

कर्मोंके चिह्नके विषयमें

कर्मोंके चिह्न जीवधारियोंके शरीरमें कालपुरुषने बनाया है इस जीवने जैसे कर्म पूर्वजन्ममें किये हैं वैसेही चिह्न उसकी देहमें बने हैं । सब जीवोंके शरीर पर चिन्ह होते हैं परन्तु मनुष्योंके शरीर पर भली भांति स्पष्ट प्रगट होते हैं इसी कारण मनुष्यकी देहहीसे इसके कर्मोंका भली प्रकार हिसाब किताब होता है । मनुष्यके शरीरके चिह्न देखनेसे भलाई बुराई जानी जाती है । जिस समय वीर्य स्त्रीके गर्भमें स्थिर होता है, उसी वीर्यके भीतर जीव होता है और उस जीवके साथ उसके पहलेके किये हुये कर्म

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कर्मबोध

हैं। उसके भाग्यके अनुसार उसका शरीर प्रस्तुत होता है तथा समस्त रंग डीलडौल पूर्वकर्मानुसार ही होता है। जब वह माताके गर्भसे निकलता है तब उसके पूर्व जन्मके कर्मोंके चिन्ह उसके शरीरके ऊपर होते हैं। पांच वर्षके भीतर चिन्ह स्पष्ट प्रकट नहीं होते जैसे जैसे यह बड़ा होता जाता है वैसेही वैसे इसके पूर्व कर्मके चिन्ह दिखाई देते जाते हैं। तिल और मस्सा-इत्यादिभी पूर्वकर्मानुसारही प्रगट होते हैं और बहुतेरे चिन्ह छिपे रहते हैं। शिरसे लेकर पैरतक सुकर्म तथा दुष्कर्मके चिन्ह भरे हुये हैं। कहीं दुर्भाग्यके तो कहीं सौभाग्यके चिन्ह होते हैं। यदि एक स्थानपर दुर्भाग्य और दूसरे स्थानपर सौभाग्य एक ही बात पर चिन्ह होवे तब उसका मध्यम फल होता है। जो लोग सामुद्रिक जानते हैं उनको यह बात मालूम होती है। सामुद्रिक विद्या अत्यन्त कठिन है। जो सामुद्रिकमें प्रवीण हो वह मनुष्यका आकार देखकर सब कुछ कह सकता है।

कबीर साहबने इस सामुद्रिक विषयमें बहुत कुछ कहा है कर्मोंके चिन्ह देखकर सामुद्रिकका ज्ञाता सब कुछ कह सकता है उदाहरण युनान देशका महातत्त्वज्ञानी सुकरात (Socrates) एक पाठशालामें अपने शिष्यको पढ़ा रहा था उस पाठशालामें एक सामुद्रिक जाननेवाला आगया। जब सुकरातके शिष्योंने जान लिया कि यह पुरुष इस प्रकारकी विद्या रखता है, तब उनको वे अपने उस्तादके निकट ले गये और कहा कि, इस पुरुषके दोष और अवगुण कहो। वह सामुद्रिक जाननेवाला इस बातको नहीं जानता था कि वह हकीम सुकरात है। उस

१ देखो पुस्तक स्वास गुंजार।

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समय उस सामुद्रिकीने सुकरातकी देहके समस्त चिह्न देखे और पहचानकर बोला कि यह मनुष्य बड़ा पाजी, दुष्ट व्यभिचारी, झूठा ठग, दगाबाज और दुष्कर्म है, यह बातें सुनकर सुकरातके शिष्यों ने उसके ठठे उड़ाये और हँसते हँसते बोले कि यह मनुष्य झूठा है तब सुकरात जो स्वयं सामुद्रिक विद्या जानता था कहने लगा कि तुम लोग इसको झूठा मत समझो । यह मनुष्य जो कहता है वह सत्य कहता है । उसमें कोई सन्देह नहीं कारण कि, उसने जो कुछ कहा उन सब बुराइयोंके चिह्न मेरे शरीरमें परिलक्षित हैं मेरे शरीरमें वे सब चिह्न ज्योंके त्यों बने हुए हैं । मेरा स्वभाव वैसाही था परंतु मैंने अपनी विद्या और योग्यतासे अपनी वासनाओंको भलीप्रकार दमन किया है, अपने हृदयको दुष्कर्मोंकी ओर हिलने नहीं दिया और भलीप्रकार दृढ़ कर लिया जिससे तनिकभी हलचल न हो ऐसी वासना दमन किया है कि वे सुरदेकी तरह होगई हैं । परंतु ये चिह्न जली हुई रस्सीकी ऐठनके समान हैं तब सुकरातके शिष्योंको निश्चय हुआ कि, हमारा उस्ताद सत्य कहता है इस प्रकार पुरुषार्थ प्रारम्भ पर जय पाता है । मनुष्यके अतिरिक्त कितनेही पशुओंमें भी यह चिह्न देखे जाते हैं जैसे कि हाथी, घोड़ा, बैल इत्यादिमें जो लोग उनको मोल लेते हैं । उनके भले बुरे चिन्होंको पहचान कर दुर्भाग्य तथा सौभाग्य जान लेते हैं । उनके कर्मोंके चिन्ह साधारणतः जड़ स्थावर पदार्थ पर प्रगट नहीं होते गुप्त रहते हैं, परंतु कभी कभी किसी चिन्हसे उनके पूर्वजन्मोंका चिन्ह प्रगट होता है और सर्व साधारण देखकर जान लेते हैं । सुतरां लगभग पैंतालीस वर्ष होते हैं जब मैं एक बस्ती चुनारगढ़में जो काशीके समीप है गया । वहाँ पर्वतपर जाके मैंने एक प्रकारका वृक्ष देखा। उस वृक्षके जड़से लेकर डालियों पर्यन्त नागरी अक्षरोंमें राम राम लिखा था । वहाँ इस प्रकारके

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अनेक वृक्ष थे । समस्त वृक्षोंकी यही दशा थी कि सबमें राम राम लिखा हुआ था । जब सर्व वृक्षोंकी यही दशा देखी तब भली भांति दृष्टि दौड़ाई जड़से ऊपर पर्यंत समानही देख पड़ा । तब अनुमान किया कि इन वृक्षों पर कोई आकर लिख गया होगा और इन वृक्षोंमेंसे एक वृक्षकी छाल हटाकर देखा तो छालके भीतर भी वही राम राम सुन्दरताके साथ लिखा हुआ था । तब निश्चय होगया कि यह किसी मनुष्यके हाथों का लिखा हुआ नहीं बरन् प्राकृतिक लिखावट है और उसकी उत्पत्तिका-लसेही वह गुण उसमें आगया है उन वृक्षोंकी यह दशा देखकर मैं गाँवमें गया लोगोंसे पूछा कि इस वृक्षका क्या नाम है तब लोगोंने कहा कि इसे रामनामी वृक्ष बोलेते हैं । उस वृक्षकी जड़में जो अक्षर थे उनकी स्याही बहुत काली थी और जैसे जैसे वे ऊपर जाते थे वैसेही वैसे स्याही फीकी पड़ती जाती थी । पतली डालोंकी स्याही बड़ी फीकी थी । परंतु पत्तोंके नामतो अत्यन्त फीकी स्याही में होंगे कि वे दिखाई भी न देते थे । उस वृक्षका वह रंग ढंग देखकर मैंने जाना कि, पूर्वकालका यह कोई भक्त है और किसी दोषवश वृक्ष होगया है ।

उस समय यमलार्जुन कुबेरके पुत्र याद आये जो नारद मुनिके शापसे दोनों वृक्ष हो गये थे कृष्णजीने उनका उद्धार किया उस वृक्षकी अवस्थासे उन्हें छुड़ाकर उनको यथार्थ स्वरूप प्रदान किया । इसी प्रकार गौतम ऋषिकी स्त्री ( अहल्या ) गौतमके शापसे पत्थर होगयी थी । श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे अपनी पूर्वा-वस्थामें प्राप्त हुई इसी प्रकार सर्व जीव कर्मके बन्धनसे पड़े हैं जड़ और चैतन्यमें सर्व फँसे हुए हैं और किसी योग्ययत्नसे कदापि नहीं छूटते उलटा दिन प्रतिदिन अधिक फँसते जाते हैं ।

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इस प्रकार सर्व जीव बन्धनमें पड़े और कर्मकी फाँसी सब जीवोंको लगी । इससे छूटना असम्भव हुआ । सहस्रों युक्तियाँ करता है परंतु प्रतिदिन बँधा जाता है । यह तीन लोक भवसागर ( उत्पत्तिसागर ) कर्मने बनाया है, कर्म-मन ब्रह्मा-काल पुरुष इत्यादि यह सब नाम इसीके हैं । इसी कर्मने यह भवसागर बनाया है और यही कर्म इस पर अधिकार कर रहा है, ब्रह्मांड और पिण्ड दोनोंकी स्थिति कर्मसे है । अनगिनती ब्रह्माण्ड हैं जिनकी सीमा नहीं । यह ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों अनगिनती नाना प्रकारके जीवोंसे परिपूर्ण है । जीवोंका अनगिनती स्वरूप तथा स्वभाव है कि जिनका कुछ विवरण हो नहीं सकता । किसीका वय लाखों वर्षका है और कोई ऐसे हैं कि एक बार स्वांसके आने जानेमें बहुत बार उत्पन्न होते और मर जाते हैं । कोई गरम हैं कोई अत्यन्त ठण्ठे हैं ये सर्व जीव वासनासे भरे हुये हैं इस भवसागरमें पड़े गोता खाया करते हैं । कभी स्वर्ग/ कभी नरक और कभी मृत्युलोकमें रहते हैं । इस चौरासी लाख योनिके जीवोंको सुख नहीं मिलता सदैव दुःखी सुखी हुआ करते हैं । चारों खानिके जीवोंमें कोई न सुखी और न सन्तुष्ट है कर्मोंके बन्धनसे सदैव इनका आवागमन हुआ करता है । यह भवसागर पशुओंसे बसा हुआ है इसमें मनुष्य कोई नहीं और जो मनुष्य हैं उनके काम क्रोध लोभ आदि वासना नहीं जबलें अपनेको वासनाओंसे पृथक् न करे तबलें मनुष्यताके योग्य न होगा । जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया यह चारों अवस्था मनमें स्थिर किया है । जबलें कलुषित कार्योंसे पृथक् न हो तबलें प्रकाशका मार्ग न

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देखेगा । इस कारण वासनाओंके आनन्दसे दूर भागना चाहिये । हंस वही है कि, जो भवसागरके दूसरे जीवोंको कालके जालमें फँसा देखकर बुद्धिमानिसे दूर भाग जावे । जबलों मनुष्य अपने को जाग्रत अवस्थामें न अधिकृत करे तबलों मनुष्यता प्राप्त न करेगा । इस जीवको वासनासे नष्ट करके भवसागरमें बाँध रखा है । समस्त बुराई तथा बन्धनकी जड़ यही वासना है । इस मनके पाँच अहंकार हैं इन्हीं पाँचोंमें स्वामी तथा सेवक सभी फँसे हुये हैं ।

इति कर्मबोधे एकोनविंशस्तरंगः


श्रीः

अथ श्रीअमरमूल प्रारंभः

भारतपथिक कबीरपंथी

स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

मुद्रक व प्रकाशक-

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेल्लुटेश्वर” स्टीम्-प्रेस, कल्याण-बम्बई.


पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “लक्ष्मीवेल्लुटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है ।

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

अमरमूल ग्रन्थ (विंश तरंग)

सत्यमुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन. धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम. पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

विंशस्तरंगः

अथ श्रीअमरमूल प्रारम्भः

धर्मदास वचन साखी

धर्मदास बिन्ती करें, मुन गुरु कृपानिधान । जरा मरन दुख मेटके, दीजे पद निर्वाण ॥ मरन काल त्रयलोकमें, अमर न दीखा कोय । यह संशय निश दिन लंगो, जीते ताहि विगोय ॥

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अमरमूल

सोरठा-हे प्रभु दीनदयाल, जक्त जीव अति दुखित है । हरहु वेग उर साल, करहु कृपा निज दास कहैं ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

धर्मदास तुम मुक्ति अधीना । सो तब कथा सुनहु परवीना ॥ जरा मरन जिवको मिटजाई । पुरुष नाम गहै चितलाई ॥ अम्बर काया तबहीं पावे । अमर शब्द घट मांहि समावे ॥ ताकी महिमा और न जानी । अमर मूलमें कहीं बखानी ॥ अमर मूल है सबते सारा । अमर मूलका कहौं विचारा ॥

साखी-अमर मूल निज ग्रंथ है, कहैं कबीर बिचार । अमर मूल जाने बिना, बूड़ा सब संसार ॥

चौपाई

अमर मूल जानौ धर्मदासू । ताकर भेद कहौं परकासू ॥ अमर नाम कबीर कहाई । अक्षर बिन बूड़ी दुनियाई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विन्ती अनुसारी । सुनहु गुरु अपराध विसारी ॥ अमर भेद साहिब कह दीजे । तृषा बुझाय अमीरस पीजे ॥ बन्दी छोड़ मुक्तिके दाता । अमर मूल कहिये विरुयाता ॥ संधि भेद कहिये निर्वारी । यहै ग्रंथ है बहुत अपारी ॥ भिन्न भिन्न सब मोहि बताई । जिह्ति मनकी संशय जाई ॥ प्रेम प्रीती तुमही सो लागी । वचन सुधा सुन हो अनुरागी ॥ अमृत नाम कबीर है सारा । पाऊँ ताहि होय निस्तारा ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

तब सतगुरु अस कहै विचारी । तुमसों ज्ञान कहों अति भारी ॥ प्रथमहि सुनो पाकर लेखा । तिहि पीछे नरिअरका लेखा ॥ तव प्रसाद मैं कहों विचारी । इतनी बातमें जीव उबारी ॥

बोधसागर

( १९३ )

शब्द विदेह भयो उच्चार । तिहिं पीछे त्रैलोक पसारा ॥ शब्दहि नाम लोक है भाई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥ निःअक्षर की परिचय होई । तब सतलोक पहुँचे है सोई ॥ जीवत लोक बैठ पुन जाई । सार शब्द महाँ रहै समाई ॥ अमर शब्दकी होय चिन्हारी । अम्बू द्वीप ताही बैठारी ॥ अम्बू द्वीप लोक कर नामा । शोभा कहा कहौं निजधामा ॥ अवर्ण रूप वणों नहिं जाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥ षोडश भान हंस को रूपा । पुरुषहि महिमा अमृत अनूपा ॥ अमर शब्द सों प्राणी भयऊ । वही शब्द सों लोकहि गयऊ ॥ पान परवाना शब्द है सारा । एही मूल सों हंस उबारा ॥ अकह नाम अक्षर है भाई । तुम निःअक्षर रहौ समाई ॥ निःअक्षर को करै निवेरा । कहैं कबीर सोई जन मेरा ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

निःअक्षर गुरु मोहि बताई । जाते हंसलोकमें जाई ॥ लोक प्रतीति करौं मैं कैसे । कहो विचार चित आवै तैसे ॥ तुम प्रभु निर्गुण भास्व सुनावा । अब कहिये सर्गुण परभावा ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

धर्मदास तुम मतिके आगर । सार शब्द कहियो सुखसागर ॥ हंसा सज्जन परम सनेही । कहियो ताहि परम पद तेही ॥ धर्मदास सो शिष्य तुम्हारा । सार शब्दको कहो सम्हारा ॥ तुम्हरे वंश कहिये उपदेशा । ज्ञानी होय तेहि कहो संदेशा ॥

साखी-मूरख सों जिन खोलिहौ, कहै कबीर विचार । ज्ञानी सों न दुराइ हौ, सुनो सत्त मत सार ॥

( १९४ )

अमरमूल

चौपाई

ज्ञानी होय जे मतिके धीरा । तहीं समाय वस्तु गम्भीरा ॥ धर्मदास सुनियो चितलाई । लोक प्रचय अब देउँ बताई ॥ निर्णय नाम निःअक्षर सारा । सर्गुण सकल कीन्ह विस्तारा ॥ निर्गुण सर्गुण बूझे कोई । सार शब्दमें रहै समोई ॥ अमर मूलका करे विचारा । धर्मदास सो शिष्य हमारा ॥ और ग्रन्थ बहुत मैं भाखा । अमर मूलकी है सब शाखा ॥ शाखा पत्र सबै लपटाना । अमर मूल काहू नहि जाना ॥ अमर मूल धर्मनि सुन लेहू । यही संदेश हंसन कहि देहू ॥ यह संतन को मत है भाई । जातें आवागवन नशाई ॥ सोई जीव उतर है पारा । नातर बूड़ मुआ संसारा ॥

साखी-ज्ञानी होय सो मानहीं, बूझे शब्द हमार ।

कहे कबीर सो बाचि है, और सकल यमधार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

पावन भेद अब कहो बुझाई । तामहिं जक्त रह्यो अरुझाई ॥ नीर भेद मोहिं कहो विचारी । बन्दी छोड़ जाउं बलिहारी ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

नीर पवन का भास्में लेली । सुकृत घटमें करौ विवेका ॥ हम टकसार ग्रन्थ यक भाखा । नीर पवन ताही महाँ राखा ॥ एही माहिं रहे लिपटाई । नीर पवन महाँ रहे भुलाई ॥

साखी-नीर पवन की उत्पति, कहे कबीर विचार ।

जो निज शब्द समावदी, सोई हंस हमार ॥

चौपाई

सार शब्द मैं कीन्ह नवेरा । नहिं माने सो जमको चेरा ॥ गर्भ वास जन्म सो धरई । जो यह लेखा बाहर परई ॥