कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कर्मबोध
हुआ और अब दूसरा उपाय कहाँ पावें, क्या करें । जो कुछ ज्ञान मिला उसीपर सन्तोष कर बैठे आगे कोई पथ वेदों तथा पुस्तकों द्वारा नहीं मिला, किसे पूछे और किसके घर जावें ।
मीमांसक और जैन कर्महीको मुक्तिमार्ग समझते हैं । परन्तु यह नहीं जानते कि, यह कर्म कहाँसे उत्पन्न हुआ है और कहाँ तक पहुँचा सकता है । यह विधि निषेध दोनों शाखा निर-अन निर्मित है । वहाँ ही तक पहुँचानेका सामर्थ्य रखते हैं । इन कर्मों द्वारा स्वर्ग तथा नरक सब कुछ प्राप्त होता है । जहाँलोग कर्मोंकी पहुँच है वहीलोग कालपुरुष हस्तक्षेप करता है । कर्मोंका सुविशाल वन है उसमें यह जीव भूलकर अपने घर-से बाहर हो गया है वनहिंसक जन्तुओंसे भरा हुआ है और सूर्य चन्द्र सितारे इत्यादि तनिक भी दिखाई नहीं देते । न कोई सड़क और न पगडण्डी है जो पगडण्डी कहीं है, सो पशुओंकी है मनुष्यकी नहीं । इस कारण इन कर्मोंके वनसे कोई बाहर हो नहीं सकता । कर्म करता है और फिर फिर कर्म करनेके लिये बारम्बार देह धारण करता है । इसको कुछ पता नहीं लगता कि वह कौन कर्म है जिससे मेरे कर्मका बन्धन कटे । वह कर्म जिससे इसका बन्धन कटे केवल स्वसंवेदकी शिक्षा है, उससे तो यह जीव अज्ञान है । इन्हीं कर्मोंकरके समस्त योनि ठहराई हैं जैनी जिनका समस्त ध्यान कर्मोंपर है वे आठ प्रकारके कर्म कहते हैं, वे ये हैं:-
१-ज्ञानवर्णी कर्म । २-दशनावर्णी कर्म । ३-वेदनी कर्म । ४-मोहिनी कर्म । ५-नाम कर्म । ६-आयु कर्म । ७-गोता कर्म । ८-अन्तराय कर्म ।