भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1047, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1047

बोधसागर

( १७९ )

अब इन आठों कर्मोंका सुविस्तृत विवरण सुनो । आवरण नाम ढक्कनका है । १ ज्ञानवर्णी कर्म अर्थात् ज्ञानका ढांकनेवाला कर्म इसके कारण ज्ञान नहीं होने पाता, यह ज्ञानके ऊपर परदा डाल देता है । इसके कारण ज्ञान जो उत्पन्न होने नहीं पाता सो ज्ञान पांच प्रकारका है ।

१-मतिज्ञान । २-श्रुतिज्ञान । ३-अवधिज्ञान । ४-मनप्रजय-ज्ञान । ५-केवल ज्ञान ।

मति ज्ञान-मति नाम बुद्धिका है अर्थात् वह ज्ञान जो बुद्धि तथा सोचसे सम्बन्ध रखता है । इस मति ज्ञानमें समस्त संसार की हुनर तथा कारीगरियां संयुक्त हैं । जिसको मतिज्ञान होता है वह कारीगरी और शिल्पकारीमें बड़ा चैतन्य रहता है । जिस किसीको मतिज्ञान आवर्णी कर्म उगता है-उसको गुणोंका पांडित्य प्राप्त नहीं होता ।

दूसरा श्रुतिज्ञान है-श्रुतिज्ञान समस्त शास्त्रोंके कण्ठस्थ करनेको कहते हैं कुछ कागज तथा ग्रन्थ इत्यादि देखनेकी आवश्यकता न हो सब बातें हृदयमें रहें । शास्त्रद्वारा तीनों कालोंकी बातोंको जानता हो उसको श्रुति केवली अथवा श्रुतिज्ञानी कहते हैं । इस श्रुतिज्ञान को जो कर्म रोकले और न होने दे उसका श्रुतिज्ञान आवर्णी कर्म नाम है ।

तीसरा अवधिज्ञान है-अवधिज्ञान उसको कहते हैं जिसके द्वारा लोग मनुष्योंके मनकी बातको जान लेते हैं । समस्त गुप्त बातोंको बतलाते हैं और अन्तर्यामी कहलाते हैं, जो कर्म इस अवधि ज्ञानपर परदा डाले और होने न दे उसको अवधिज्ञानवर्णी कहते हैं ।

चौथा मन प्रजय ज्ञान है-मनप्रजय ज्ञान उसको कहते हैं कि जो हृदयकी गतिको जाने । अर्थात् जहां हृदय दौड़े वह सब कुछ

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 1047, कुल 2136 में से · BharatKosha