कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कर्मबोध
मालूम करले हृदयकी समस्त चाल तथा स्थिरताको बूझ ले जो कोई इस प्रकारकी विद्या रखता हो उसको मन प्रजयज्ञानी जानते हैं। मन प्रजय ज्ञानमें यह गुण है कि, जब जिसको यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है फिर कभी नहीं जाता। मन प्रजयज्ञानी अवश्य-ही केवल ज्ञानका अधिकारी हो जाता है, पूर्वके तीन ज्ञानोंमें तो संदेह रहता है क्योंकि वे होते हैं और जाते भी रहते हैं परंतु मन प्रजयको स्थिरता तथा स्थिति है, मनप्रजय ज्ञान अवधिज्ञानसे बहुत बढ़के है। जो कर्म इस मनप्रजय ज्ञानको छिपा लेता है और नहीं होने देता उसको मनप्रजय आवर्णी कर्म कहते हैं।
पांचवां केवलज्ञान है—यह सबसे बढ़कर है। यह समस्त-ज्ञानोंका राजा है। जैनी ऐसा मानते हैं कि इस केवल ज्ञानसे कोई बात छिपी नहीं रहती। सबसे उच्च श्रेणी ज्ञानकी यही है। जैनके चौबीस तीर्थंकर सब केवल ज्ञानी होते हैं उनके अतिरिक्त और कितने दूसरे साधू भी केवल ज्ञान रखते हैं। इस केवल ज्ञानको जो छिपाये रखे और न प्रकाशित होने दे उसका नाम केवल ज्ञानवर्णी कर्म है। दूसरा दशनावर्णी कर्म है—जिसके कारण प्रत्यक्षमें दर्शन नहीं होता और उसके परदेमें अलख करतार रहता है। उसकी चार शाखायें हैं।
तीसरा वेदनी कर्म है—जिसके कारण जीवको दुःख सुख होता है। उसकी दो शाखायें हैं।
चौथा मोहिनी कर्म है—उसकी दो शाखायें हैं।
पांचवां आयु कर्म है—इससे आपदाका अन्दाजा होता है और इसकी चार शाखायें हैं।
छठवें नाम कर्म है—इसकी तिरानवे शाखायें हैं। यह नाम कर्म जीव धारियोंकी मूर्ति और स्वरूप बनाता है।