कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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सातवां गोटकर्म है—इस गोट कर्मकी शास्त्रायें हैं। एकसे नीची जगह और दूसरी ऊँची जगह जीव देह धरकर उत्पन्न होता है आठवां अन्तराय कर्म है—उसकी दो शास्त्रायें हैं। इस अन्तराय कर्म का यह काम है कि जो ज्ञान होनेवाला हो उसको होने दे उसमें विभिन्नता डाल दे आठों कामोंका विवरण मैं ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें लिख आया हूँ जो चाहे सो देखले। इन्हीं आठकर्मों से समस्त जीव चार खानि चौरासी लाख योनियें आवागमन किया करते हैं। कर्मोंपासना और ज्ञान भी सविस्तर रूपसे वहीँ लिखा है जिससे स्पष्ट प्रगट होता है कि इस जीवका आवागमन कैसे सुकर्म तथा कुकर्मोंसे हुआ करता है। यह समस्तकर्म तो भ्रमरूप हैं। इनसे कदापि छुटकारा नहीं होता। जिसको वेद धर्मके लोक और जैनी केवल ज्ञान कहते हैं सौ केवल ज्ञान शुद्ध नहीं है इसमें अन्धकार है इस कारण इन केवल ज्ञानियोंको स्वच्छ प्रकाश नहीं है, जिससे वे लोग मुक्तिकी सुधि नहीं रखते हैं, जीवके कर्म ही उसका स्वरूप बनाते हैं। कर्मोंसे ही इस जीवका आवागमन चारों खानियें बराबर बना रहता है। सत्यगुरु भेद बतलावे तो आवागमन सम्बन्ध टूटे।
मुसहद
तू है करतार किब्रिया बारी। तेरा है हुकम सब जगह जारी। तेरी तसबीर सुबुक और भारी। नकशहा सब शिगरफोजंगारी आलमोंका है सारे काम तुम्हें। ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही इनसान हुआ तूही हैवान। तूही रहबर हुआ तूही शैतान॥ जिस्म सदहाव एकही हैं जान। होवे क्योकरबयां तुहारी शान॥