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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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अब इन आठों कर्मोंका सुविस्तृत विवरण सुनो । आवरण नाम ढक्कनका है । १ ज्ञानवर्णी कर्म अर्थात् ज्ञानका ढांकनेवाला कर्म इसके कारण ज्ञान नहीं होने पाता, यह ज्ञानके ऊपर परदा डाल देता है । इसके कारण ज्ञान जो उत्पन्न होने नहीं पाता सो ज्ञान पांच प्रकारका है ।

१-मतिज्ञान । २-श्रुतिज्ञान । ३-अवधिज्ञान । ४-मनप्रजय-ज्ञान । ५-केवल ज्ञान ।

मति ज्ञान-मति नाम बुद्धिका है अर्थात् वह ज्ञान जो बुद्धि तथा सोचसे सम्बन्ध रखता है । इस मति ज्ञानमें समस्त संसार की हुनर तथा कारीगरियां संयुक्त हैं । जिसको मतिज्ञान होता है वह कारीगरी और शिल्पकारीमें बड़ा चैतन्य रहता है । जिस किसीको मतिज्ञान आवर्णी कर्म उगता है-उसको गुणोंका पांडित्य प्राप्त नहीं होता ।

दूसरा श्रुतिज्ञान है-श्रुतिज्ञान समस्त शास्त्रोंके कण्ठस्थ करनेको कहते हैं कुछ कागज तथा ग्रन्थ इत्यादि देखनेकी आवश्यकता न हो सब बातें हृदयमें रहें । शास्त्रद्वारा तीनों कालोंकी बातोंको जानता हो उसको श्रुति केवली अथवा श्रुतिज्ञानी कहते हैं । इस श्रुतिज्ञान को जो कर्म रोकले और न होने दे उसका श्रुतिज्ञान आवर्णी कर्म नाम है ।

तीसरा अवधिज्ञान है-अवधिज्ञान उसको कहते हैं जिसके द्वारा लोग मनुष्योंके मनकी बातको जान लेते हैं । समस्त गुप्त बातोंको बतलाते हैं और अन्तर्यामी कहलाते हैं, जो कर्म इस अवधि ज्ञानपर परदा डाले और होने न दे उसको अवधिज्ञानवर्णी कहते हैं ।

चौथा मन प्रजय ज्ञान है-मनप्रजय ज्ञान उसको कहते हैं कि जो हृदयकी गतिको जाने । अर्थात् जहां हृदय दौड़े वह सब कुछ

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कर्मबोध

मालूम करले हृदयकी समस्त चाल तथा स्थिरताको बूझ ले जो कोई इस प्रकारकी विद्या रखता हो उसको मन प्रजयज्ञानी जानते हैं। मन प्रजय ज्ञानमें यह गुण है कि, जब जिसको यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है फिर कभी नहीं जाता। मन प्रजयज्ञानी अवश्य-ही केवल ज्ञानका अधिकारी हो जाता है, पूर्वके तीन ज्ञानोंमें तो संदेह रहता है क्योंकि वे होते हैं और जाते भी रहते हैं परंतु मन प्रजयको स्थिरता तथा स्थिति है, मनप्रजय ज्ञान अवधिज्ञानसे बहुत बढ़के है। जो कर्म इस मनप्रजय ज्ञानको छिपा लेता है और नहीं होने देता उसको मनप्रजय आवर्णी कर्म कहते हैं।

पांचवां केवलज्ञान है—यह सबसे बढ़कर है। यह समस्त-ज्ञानोंका राजा है। जैनी ऐसा मानते हैं कि इस केवल ज्ञानसे कोई बात छिपी नहीं रहती। सबसे उच्च श्रेणी ज्ञानकी यही है। जैनके चौबीस तीर्थंकर सब केवल ज्ञानी होते हैं उनके अतिरिक्त और कितने दूसरे साधू भी केवल ज्ञान रखते हैं। इस केवल ज्ञानको जो छिपाये रखे और न प्रकाशित होने दे उसका नाम केवल ज्ञानवर्णी कर्म है। दूसरा दशनावर्णी कर्म है—जिसके कारण प्रत्यक्षमें दर्शन नहीं होता और उसके परदेमें अलख करतार रहता है। उसकी चार शाखायें हैं।

तीसरा वेदनी कर्म है—जिसके कारण जीवको दुःख सुख होता है। उसकी दो शाखायें हैं।

चौथा मोहिनी कर्म है—उसकी दो शाखायें हैं।

पांचवां आयु कर्म है—इससे आपदाका अन्दाजा होता है और इसकी चार शाखायें हैं।

छठवें नाम कर्म है—इसकी तिरानवे शाखायें हैं। यह नाम कर्म जीव धारियोंकी मूर्ति और स्वरूप बनाता है।

बोधसागर

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सातवां गोटकर्म है—इस गोट कर्मकी शास्त्रायें हैं। एकसे नीची जगह और दूसरी ऊँची जगह जीव देह धरकर उत्पन्न होता है आठवां अन्तराय कर्म है—उसकी दो शास्त्रायें हैं। इस अन्तराय कर्म का यह काम है कि जो ज्ञान होनेवाला हो उसको होने दे उसमें विभिन्नता डाल दे आठों कामोंका विवरण मैं ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें लिख आया हूँ जो चाहे सो देखले। इन्हीं आठकर्मों से समस्त जीव चार खानि चौरासी लाख योनियें आवागमन किया करते हैं। कर्मोंपासना और ज्ञान भी सविस्तर रूपसे वहीँ लिखा है जिससे स्पष्ट प्रगट होता है कि इस जीवका आवागमन कैसे सुकर्म तथा कुकर्मोंसे हुआ करता है। यह समस्तकर्म तो भ्रमरूप हैं। इनसे कदापि छुटकारा नहीं होता। जिसको वेद धर्मके लोक और जैनी केवल ज्ञान कहते हैं सौ केवल ज्ञान शुद्ध नहीं है इसमें अन्धकार है इस कारण इन केवल ज्ञानियोंको स्वच्छ प्रकाश नहीं है, जिससे वे लोग मुक्तिकी सुधि नहीं रखते हैं, जीवके कर्म ही उसका स्वरूप बनाते हैं। कर्मोंसे ही इस जीवका आवागमन चारों खानियें बराबर बना रहता है। सत्यगुरु भेद बतलावे तो आवागमन सम्बन्ध टूटे।

मुसहद

तू है करतार किब्रिया बारी। तेरा है हुकम सब जगह जारी। तेरी तसबीर सुबुक और भारी। नकशहा सब शिगरफोजंगारी आलमोंका है सारे काम तुम्हें। ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही इनसान हुआ तूही हैवान। तूही रहबर हुआ तूही शैतान॥ जिस्म सदहाव एकही हैं जान। होवे क्योकरबयां तुहारी शान॥

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कर्मबोध

लोक तीनों दिया इनाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

मालिक व आदमवजित्रनो परी । हवशी हिन्दीवखबर औरतरी ॥ रंगबिरंग ढंग चार खान करे । अदलो इनसाफ साफसाफ करे ॥

दिया आलमका इन्तजाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

बन्दः साहब कहीं किया है जुदा । कहीं बन बैठे आप आद खुदा ॥ सारे आलममें तेरी सूतोसदा । तुझेसे सारे शरी शाहो गदा ॥

सिजदा करते हैं खासो आम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही वाचून और तुही बचून । सूरत सूत्र तुझीने गूनागून ॥ तूही मकबूल औ तूही मलऊन । तूही खुद रमरहा है सारंजून

दे जमीनों जमा तआम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही जेरीन दरमयां बाला । मनका मनका हुआ तुही माला ॥ तूही पैदा किया तूही पाला । तूही सबजा हुआ तुही जाला ॥

कौन पहचान अकल खाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

इन्द्र ब्रह्म व विष्णु भी भूले । अपने अमलोंके झोकमें झूले ॥ कहीं पजपुरदा और कहीं फूले । हिसं हवां घर बघर डोले ॥

दे रहीमो करीम नाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

आशकोंको दिखाया राहे सवाब । फासिकोंके लिये सहीद अजाब

बोधसागर

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साराअलम बना खयालोख्वाब । कोई नदेरी ना सारने कशबरआब

सारे जान्दार दे गुलाम तुम्हें ।

ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥

सारे जान्दारको फँसा मारा । नहीं इस जीवका रहा चारा ॥ करके तदबीर तुमसे सब हारा । जिन्दाकरकरके फिर फिर मारा॥

दे मुकद्दर बदस्त दाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही बखसिन्दा हैअपनो अमाँ । मातहत तेरे सब हैंजिसमो जाँ॥ तुझसे पैदा है वाणीवदो कुराँ । अबिदानो जादिदाने जमाँ ॥

याद करते हैं सुबहौं शाम तुम्हें ।

ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥

सारे मजहब जहाँमें जारी है । पीर सुरशिदकी राहदारी है ॥ अर्शफ़शोंकी सब तयारी है । आजिज इसरारसे सब आरी है॥ पेशवा भी किये इनाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सदसलाम तुम्हें॥

कर्मोंके चिह्नके विषयमें

कर्मोंके चिह्न जीवधारियोंके शरीरमें कालपुरुषने बनाया है इस जीवने जैसे कर्म पूर्वजन्ममें किये हैं वैसेही चिह्न उसकी देहमें बने हैं । सब जीवोंके शरीर पर चिन्ह होते हैं परन्तु मनुष्योंके शरीर पर भली भांति स्पष्ट प्रगट होते हैं इसी कारण मनुष्यकी देहहीसे इसके कर्मोंका भली प्रकार हिसाब किताब होता है । मनुष्यके शरीरके चिह्न देखनेसे भलाई बुराई जानी जाती है । जिस समय वीर्य स्त्रीके गर्भमें स्थिर होता है, उसी वीर्यके भीतर जीव होता है और उस जीवके साथ उसके पहलेके किये हुये कर्म

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कर्मबोध

हैं। उसके भाग्यके अनुसार उसका शरीर प्रस्तुत होता है तथा समस्त रंग डीलडौल पूर्वकर्मानुसार ही होता है। जब वह माताके गर्भसे निकलता है तब उसके पूर्व जन्मके कर्मोंके चिन्ह उसके शरीरके ऊपर होते हैं। पांच वर्षके भीतर चिन्ह स्पष्ट प्रकट नहीं होते जैसे जैसे यह बड़ा होता जाता है वैसेही वैसे इसके पूर्व कर्मके चिन्ह दिखाई देते जाते हैं। तिल और मस्सा-इत्यादिभी पूर्वकर्मानुसारही प्रगट होते हैं और बहुतेरे चिन्ह छिपे रहते हैं। शिरसे लेकर पैरतक सुकर्म तथा दुष्कर्मके चिन्ह भरे हुये हैं। कहीं दुर्भाग्यके तो कहीं सौभाग्यके चिन्ह होते हैं। यदि एक स्थानपर दुर्भाग्य और दूसरे स्थानपर सौभाग्य एक ही बात पर चिन्ह होवे तब उसका मध्यम फल होता है। जो लोग सामुद्रिक जानते हैं उनको यह बात मालूम होती है। सामुद्रिक विद्या अत्यन्त कठिन है। जो सामुद्रिकमें प्रवीण हो वह मनुष्यका आकार देखकर सब कुछ कह सकता है।

कबीर साहबने इस सामुद्रिक विषयमें बहुत कुछ कहा है कर्मोंके चिन्ह देखकर सामुद्रिकका ज्ञाता सब कुछ कह सकता है उदाहरण युनान देशका महातत्त्वज्ञानी सुकरात (Socrates) एक पाठशालामें अपने शिष्यको पढ़ा रहा था उस पाठशालामें एक सामुद्रिक जाननेवाला आगया। जब सुकरातके शिष्योंने जान लिया कि यह पुरुष इस प्रकारकी विद्या रखता है, तब उनको वे अपने उस्तादके निकट ले गये और कहा कि, इस पुरुषके दोष और अवगुण कहो। वह सामुद्रिक जाननेवाला इस बातको नहीं जानता था कि वह हकीम सुकरात है। उस

१ देखो पुस्तक स्वास गुंजार।

बोधसागर

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समय उस सामुद्रिकीने सुकरातकी देहके समस्त चिह्न देखे और पहचानकर बोला कि यह मनुष्य बड़ा पाजी, दुष्ट व्यभिचारी, झूठा ठग, दगाबाज और दुष्कर्म है, यह बातें सुनकर सुकरातके शिष्यों ने उसके ठठे उड़ाये और हँसते हँसते बोले कि यह मनुष्य झूठा है तब सुकरात जो स्वयं सामुद्रिक विद्या जानता था कहने लगा कि तुम लोग इसको झूठा मत समझो । यह मनुष्य जो कहता है वह सत्य कहता है । उसमें कोई सन्देह नहीं कारण कि, उसने जो कुछ कहा उन सब बुराइयोंके चिह्न मेरे शरीरमें परिलक्षित हैं मेरे शरीरमें वे सब चिह्न ज्योंके त्यों बने हुए हैं । मेरा स्वभाव वैसाही था परंतु मैंने अपनी विद्या और योग्यतासे अपनी वासनाओंको भलीप्रकार दमन किया है, अपने हृदयको दुष्कर्मोंकी ओर हिलने नहीं दिया और भलीप्रकार दृढ़ कर लिया जिससे तनिकभी हलचल न हो ऐसी वासना दमन किया है कि वे सुरदेकी तरह होगई हैं । परंतु ये चिह्न जली हुई रस्सीकी ऐठनके समान हैं तब सुकरातके शिष्योंको निश्चय हुआ कि, हमारा उस्ताद सत्य कहता है इस प्रकार पुरुषार्थ प्रारम्भ पर जय पाता है । मनुष्यके अतिरिक्त कितनेही पशुओंमें भी यह चिह्न देखे जाते हैं जैसे कि हाथी, घोड़ा, बैल इत्यादिमें जो लोग उनको मोल लेते हैं । उनके भले बुरे चिन्होंको पहचान कर दुर्भाग्य तथा सौभाग्य जान लेते हैं । उनके कर्मोंके चिन्ह साधारणतः जड़ स्थावर पदार्थ पर प्रगट नहीं होते गुप्त रहते हैं, परंतु कभी कभी किसी चिन्हसे उनके पूर्वजन्मोंका चिन्ह प्रगट होता है और सर्व साधारण देखकर जान लेते हैं । सुतरां लगभग पैंतालीस वर्ष होते हैं जब मैं एक बस्ती चुनारगढ़में जो काशीके समीप है गया । वहाँ पर्वतपर जाके मैंने एक प्रकारका वृक्ष देखा। उस वृक्षके जड़से लेकर डालियों पर्यन्त नागरी अक्षरोंमें राम राम लिखा था । वहाँ इस प्रकारके

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कर्मबोध

अनेक वृक्ष थे । समस्त वृक्षोंकी यही दशा थी कि सबमें राम राम लिखा हुआ था । जब सर्व वृक्षोंकी यही दशा देखी तब भली भांति दृष्टि दौड़ाई जड़से ऊपर पर्यंत समानही देख पड़ा । तब अनुमान किया कि इन वृक्षों पर कोई आकर लिख गया होगा और इन वृक्षोंमेंसे एक वृक्षकी छाल हटाकर देखा तो छालके भीतर भी वही राम राम सुन्दरताके साथ लिखा हुआ था । तब निश्चय होगया कि यह किसी मनुष्यके हाथों का लिखा हुआ नहीं बरन् प्राकृतिक लिखावट है और उसकी उत्पत्तिका-लसेही वह गुण उसमें आगया है उन वृक्षोंकी यह दशा देखकर मैं गाँवमें गया लोगोंसे पूछा कि इस वृक्षका क्या नाम है तब लोगोंने कहा कि इसे रामनामी वृक्ष बोलेते हैं । उस वृक्षकी जड़में जो अक्षर थे उनकी स्याही बहुत काली थी और जैसे जैसे वे ऊपर जाते थे वैसेही वैसे स्याही फीकी पड़ती जाती थी । पतली डालोंकी स्याही बड़ी फीकी थी । परंतु पत्तोंके नामतो अत्यन्त फीकी स्याही में होंगे कि वे दिखाई भी न देते थे । उस वृक्षका वह रंग ढंग देखकर मैंने जाना कि, पूर्वकालका यह कोई भक्त है और किसी दोषवश वृक्ष होगया है ।

उस समय यमलार्जुन कुबेरके पुत्र याद आये जो नारद मुनिके शापसे दोनों वृक्ष हो गये थे कृष्णजीने उनका उद्धार किया उस वृक्षकी अवस्थासे उन्हें छुड़ाकर उनको यथार्थ स्वरूप प्रदान किया । इसी प्रकार गौतम ऋषिकी स्त्री ( अहल्या ) गौतमके शापसे पत्थर होगयी थी । श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे अपनी पूर्वा-वस्थामें प्राप्त हुई इसी प्रकार सर्व जीव कर्मके बन्धनसे पड़े हैं जड़ और चैतन्यमें सर्व फँसे हुए हैं और किसी योग्ययत्नसे कदापि नहीं छूटते उलटा दिन प्रतिदिन अधिक फँसते जाते हैं ।

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इस प्रकार सर्व जीव बन्धनमें पड़े और कर्मकी फाँसी सब जीवोंको लगी । इससे छूटना असम्भव हुआ । सहस्रों युक्तियाँ करता है परंतु प्रतिदिन बँधा जाता है । यह तीन लोक भवसागर ( उत्पत्तिसागर ) कर्मने बनाया है, कर्म-मन ब्रह्मा-काल पुरुष इत्यादि यह सब नाम इसीके हैं । इसी कर्मने यह भवसागर बनाया है और यही कर्म इस पर अधिकार कर रहा है, ब्रह्मांड और पिण्ड दोनोंकी स्थिति कर्मसे है । अनगिनती ब्रह्माण्ड हैं जिनकी सीमा नहीं । यह ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों अनगिनती नाना प्रकारके जीवोंसे परिपूर्ण है । जीवोंका अनगिनती स्वरूप तथा स्वभाव है कि जिनका कुछ विवरण हो नहीं सकता । किसीका वय लाखों वर्षका है और कोई ऐसे हैं कि एक बार स्वांसके आने जानेमें बहुत बार उत्पन्न होते और मर जाते हैं । कोई गरम हैं कोई अत्यन्त ठण्ठे हैं ये सर्व जीव वासनासे भरे हुये हैं इस भवसागरमें पड़े गोता खाया करते हैं । कभी स्वर्ग/ कभी नरक और कभी मृत्युलोकमें रहते हैं । इस चौरासी लाख योनिके जीवोंको सुख नहीं मिलता सदैव दुःखी सुखी हुआ करते हैं । चारों खानिके जीवोंमें कोई न सुखी और न सन्तुष्ट है कर्मोंके बन्धनसे सदैव इनका आवागमन हुआ करता है । यह भवसागर पशुओंसे बसा हुआ है इसमें मनुष्य कोई नहीं और जो मनुष्य हैं उनके काम क्रोध लोभ आदि वासना नहीं जबलें अपनेको वासनाओंसे पृथक् न करे तबलें मनुष्यताके योग्य न होगा । जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया यह चारों अवस्था मनमें स्थिर किया है । जबलें कलुषित कार्योंसे पृथक् न हो तबलें प्रकाशका मार्ग न

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कर्मबोध

देखेगा । इस कारण वासनाओंके आनन्दसे दूर भागना चाहिये । हंस वही है कि, जो भवसागरके दूसरे जीवोंको कालके जालमें फँसा देखकर बुद्धिमानिसे दूर भाग जावे । जबलों मनुष्य अपने को जाग्रत अवस्थामें न अधिकृत करे तबलों मनुष्यता प्राप्त न करेगा । इस जीवको वासनासे नष्ट करके भवसागरमें बाँध रखा है । समस्त बुराई तथा बन्धनकी जड़ यही वासना है । इस मनके पाँच अहंकार हैं इन्हीं पाँचोंमें स्वामी तथा सेवक सभी फँसे हुये हैं ।

इति कर्मबोधे एकोनविंशस्तरंगः


श्रीः

अथ श्रीअमरमूल प्रारंभः

भारतपथिक कबीरपंथी

स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

मुद्रक व प्रकाशक-

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेल्लुटेश्वर” स्टीम्-प्रेस, कल्याण-बम्बई.


पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “लक्ष्मीवेल्लुटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है ।

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

अमरमूल ग्रन्थ (विंश तरंग)

सत्यमुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन. धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम. पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

विंशस्तरंगः

अथ श्रीअमरमूल प्रारम्भः

धर्मदास वचन साखी

धर्मदास बिन्ती करें, मुन गुरु कृपानिधान । जरा मरन दुख मेटके, दीजे पद निर्वाण ॥ मरन काल त्रयलोकमें, अमर न दीखा कोय । यह संशय निश दिन लंगो, जीते ताहि विगोय ॥

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अमरमूल

सोरठा-हे प्रभु दीनदयाल, जक्त जीव अति दुखित है । हरहु वेग उर साल, करहु कृपा निज दास कहैं ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

धर्मदास तुम मुक्ति अधीना । सो तब कथा सुनहु परवीना ॥ जरा मरन जिवको मिटजाई । पुरुष नाम गहै चितलाई ॥ अम्बर काया तबहीं पावे । अमर शब्द घट मांहि समावे ॥ ताकी महिमा और न जानी । अमर मूलमें कहीं बखानी ॥ अमर मूल है सबते सारा । अमर मूलका कहौं विचारा ॥

साखी-अमर मूल निज ग्रंथ है, कहैं कबीर बिचार । अमर मूल जाने बिना, बूड़ा सब संसार ॥

चौपाई

अमर मूल जानौ धर्मदासू । ताकर भेद कहौं परकासू ॥ अमर नाम कबीर कहाई । अक्षर बिन बूड़ी दुनियाई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विन्ती अनुसारी । सुनहु गुरु अपराध विसारी ॥ अमर भेद साहिब कह दीजे । तृषा बुझाय अमीरस पीजे ॥ बन्दी छोड़ मुक्तिके दाता । अमर मूल कहिये विरुयाता ॥ संधि भेद कहिये निर्वारी । यहै ग्रंथ है बहुत अपारी ॥ भिन्न भिन्न सब मोहि बताई । जिह्ति मनकी संशय जाई ॥ प्रेम प्रीती तुमही सो लागी । वचन सुधा सुन हो अनुरागी ॥ अमृत नाम कबीर है सारा । पाऊँ ताहि होय निस्तारा ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

तब सतगुरु अस कहै विचारी । तुमसों ज्ञान कहों अति भारी ॥ प्रथमहि सुनो पाकर लेखा । तिहि पीछे नरिअरका लेखा ॥ तव प्रसाद मैं कहों विचारी । इतनी बातमें जीव उबारी ॥

बोधसागर

( १९३ )

शब्द विदेह भयो उच्चार । तिहिं पीछे त्रैलोक पसारा ॥ शब्दहि नाम लोक है भाई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥ निःअक्षर की परिचय होई । तब सतलोक पहुँचे है सोई ॥ जीवत लोक बैठ पुन जाई । सार शब्द महाँ रहै समाई ॥ अमर शब्दकी होय चिन्हारी । अम्बू द्वीप ताही बैठारी ॥ अम्बू द्वीप लोक कर नामा । शोभा कहा कहौं निजधामा ॥ अवर्ण रूप वणों नहिं जाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥ षोडश भान हंस को रूपा । पुरुषहि महिमा अमृत अनूपा ॥ अमर शब्द सों प्राणी भयऊ । वही शब्द सों लोकहि गयऊ ॥ पान परवाना शब्द है सारा । एही मूल सों हंस उबारा ॥ अकह नाम अक्षर है भाई । तुम निःअक्षर रहौ समाई ॥ निःअक्षर को करै निवेरा । कहैं कबीर सोई जन मेरा ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

निःअक्षर गुरु मोहि बताई । जाते हंसलोकमें जाई ॥ लोक प्रतीति करौं मैं कैसे । कहो विचार चित आवै तैसे ॥ तुम प्रभु निर्गुण भास्व सुनावा । अब कहिये सर्गुण परभावा ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

धर्मदास तुम मतिके आगर । सार शब्द कहियो सुखसागर ॥ हंसा सज्जन परम सनेही । कहियो ताहि परम पद तेही ॥ धर्मदास सो शिष्य तुम्हारा । सार शब्दको कहो सम्हारा ॥ तुम्हरे वंश कहिये उपदेशा । ज्ञानी होय तेहि कहो संदेशा ॥

साखी-मूरख सों जिन खोलिहौ, कहै कबीर विचार । ज्ञानी सों न दुराइ हौ, सुनो सत्त मत सार ॥

( १९४ )

अमरमूल

चौपाई

ज्ञानी होय जे मतिके धीरा । तहीं समाय वस्तु गम्भीरा ॥ धर्मदास सुनियो चितलाई । लोक प्रचय अब देउँ बताई ॥ निर्णय नाम निःअक्षर सारा । सर्गुण सकल कीन्ह विस्तारा ॥ निर्गुण सर्गुण बूझे कोई । सार शब्दमें रहै समोई ॥ अमर मूलका करे विचारा । धर्मदास सो शिष्य हमारा ॥ और ग्रन्थ बहुत मैं भाखा । अमर मूलकी है सब शाखा ॥ शाखा पत्र सबै लपटाना । अमर मूल काहू नहि जाना ॥ अमर मूल धर्मनि सुन लेहू । यही संदेश हंसन कहि देहू ॥ यह संतन को मत है भाई । जातें आवागवन नशाई ॥ सोई जीव उतर है पारा । नातर बूड़ मुआ संसारा ॥

साखी-ज्ञानी होय सो मानहीं, बूझे शब्द हमार ।

कहे कबीर सो बाचि है, और सकल यमधार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

पावन भेद अब कहो बुझाई । तामहिं जक्त रह्यो अरुझाई ॥ नीर भेद मोहिं कहो विचारी । बन्दी छोड़ जाउं बलिहारी ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

नीर पवन का भास्में लेली । सुकृत घटमें करौ विवेका ॥ हम टकसार ग्रन्थ यक भाखा । नीर पवन ताही महाँ राखा ॥ एही माहिं रहे लिपटाई । नीर पवन महाँ रहे भुलाई ॥

साखी-नीर पवन की उत्पति, कहे कबीर विचार ।

जो निज शब्द समावदी, सोई हंस हमार ॥

चौपाई

सार शब्द मैं कीन्ह नवेरा । नहिं माने सो जमको चेरा ॥ गर्भ वास जन्म सो धरई । जो यह लेखा बाहर परई ॥

बोधसागर

( ११५ )

छत्तिस नीर पचासी पवना । तासों रची सकल ही भवना॥ यह हो भेद कालको दीन्हा । नाम जो एक गुप्त हम कीन्हा॥ नाम भेद जो पावे सांचा । सोई जीव काल सौ बांचा ॥

सारखी-सार शब्द जो जानही, सो जेहै भव गीत ।

नातो जमपुर जायँगे, कठिन काल विपरीत ॥

चौपाई

गोरख पवन साध मर गयऊ । नाम प्रचय अजहूँ नहिं भयऊ॥

ब्यास देव ज्योतिषहि विचारा । लगन सोधकर घरी सम्हारा ॥

नामहि सार चित्त नहिं दीन्हा । लभ मुहूरत सब गहि लीन्हा ॥

सारखी-लभ मुहूरत साधिया, कर्म का भीत बनाय ।

भर्म टरै सद्गुरु मिलै, तबहीं लोकहि जाय ॥

चौपाई

यहै भर्म तब छूटै भाई । सतगुरु शब्द गहे चित लाई॥

नाम पान मैं कहौं बिचारी । जातैं छूटै भर्म किबारी ॥

मोह नसे सत चौकी होई । तबहि नाम कहैं पावै सोई ॥

ताते पान प्रवाना भाखा । भक्ति ज्ञान ताकर है साखा ॥

बिना नाम नहिं उतरे पारा । कैसे साध कहावे सारा ॥

पढ़ पढ़ विद्या वेद पुराना । नाम विना नहिं होय प्रमाना॥

चारहि गुरु जक्तमहैं कीन्हा । तिनके हाथ मुक्ति हमदीन्हा ॥

वे हंसन कहे लोक पठावैं । भवसागर मंह बहुरि न आवैं ॥

सारखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड़ अश ।

मुक्ति राज मैं दीन्हऊँ, अटल ब्यालिसहि वंश॥

चौपाई

धर्मदास तुम मतके धीरा । तातैं दीन्ह मुक्ति कों वीरा ॥

तुमतैं जीव उतर है पारा । दीन्हा सौप जक्त को भारा ॥

राय बकेजी चतुर्भुज राजा । सहतेजी गुरु तहां बिराजा ॥

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अमरमूल

साखी-राय बंकेजी चतुर्भुज, सहते जी हैरान । येहि छुड़ाय हरेक हीं, शब्द देहिं पहिचान ॥

चौपाई

यही छुड़ाय काल सों हंसा । शब्दहि दै कर हैं निःशंसा ॥ तुम धर्मदास ब्यालिसहि वंशा । ये निज आंहि पुरुषके अंशा॥ इन कहिये सौप दीन्ह जिवभारा । सब जीवनको करे उबारा ॥ इनही छोड़ अन्त चित लावै । जन्म जन्म सो भटका खावै॥ वंश ब्यालिस तुम्हरे सारा । और सकल सब छूठ पसारा ॥

साखी-नाम भेद जो जानही, सोई वंश हमार ।

नातर दुनियां बहुत ही, बूढ़ सुआ संसार ॥

चौपाई

धर्मदास मैं कहों बिचारी । यह विधि निबहै यह संसारी॥ काल कठिन है बहुत अपारा । जिन यह सृष्टि कीन्ह संहारा॥ ता कहैं कोइ न जाने भाई । कालहि सुमरण करहिं बनाई ॥ काल दुःख दे सबहि रुवावे । शब्द होय तहैं माथ नवावे ॥ नाम एक गुप्त है अमोला । सो धर्मनि मैं तुमसे खोला ॥ जो यह नाम को करे सम्हारा । सो भवसागर उतरे पारा ॥ तुम कहैं दीन्ह शब्द उपदेशा । सो हंसन कहैं कहौ सँदेशा ॥ ज्ञान प्रकाश जाहि घट होई । जीवन मुक्ति पावे जन सोई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहैं सुनिय गुसाई । जीवन मुक्ति कहो ससुझाई ॥ जीवन मुक्ति कहौ किमि जाना । लोक वेद कैसे पहिचाना ॥ सो मोसां यह कहिये भेदा । जिहँतें मनकी संशय छेदा ॥

सदगुरु वचन-चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । वह निज भेद कहौ तुम पासू ॥ उग्र ज्ञान जाके घट होई । मुक्ति भेद कहैं पावै सोई ॥

बोधसागर

( १९७ )

अब मैं कहौं ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करौ प्रवेशा ॥ मुक्ति नाम निःसंशय होई । अमर नाम जब सुर्त समोई ॥ जहँलग कहि जिभ्या करगाया । तहँ लग जानौं सो सब माया ॥ अकह नाम कहा नहि जाई । घट २ व्याप्त निरंतर आई ॥ नाद शब्द जबहीं उच्चारा । तासौं अक्षर भयो बिस्तारा ॥ अक्षर हीते उपजी माया । संशय भई सबनकी काया ॥ तब ही शब्द सुर्त मन लाया । मन थिर भए नहीं है माया ॥ स्थिर घट मन लहर समानी । मुक्तिरूप तबही पहिचानी ॥ सो निःकर्म जीव हमारा । कर्म काट भव उत्तरे पारा ॥ जो यह गहै शब्द मन लाई । ताकर आवागमन नसाई ॥ सीखै पढ़ै काम नहि आवै । कर्म जीव मुक्ति नहि पावै ॥ ज्ञान प्रकाश जाहि घट होई । ताके हृदय मोह नहि कोई ॥ जैसे सूरज बादल हँधा । ऐसे मोह ज्ञान कहँ भँदा ॥ जब लग मोह न छूटे भाई । तबलग नाम न हृदय समाई ॥ जबलग मोह रहै तन बासा । तबलग नहीं ज्ञान प्रकाशा ॥ जन्म जन्म कर भक्त जो होई । तबहि नाम कहँ पावै सोई ॥ कोटिन जन्म भक्ति जिन कीन्हा । अमर मूल तबही पर चीन्हा ॥ अमर मूल कर पावे भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास बिनती अनुसारी । सदगुरु वचन जाऊँ बलिहारी ॥ जिहि विधिममन होय अछेदा । सो समरथ कहि दीजे भेदा ॥ जो मोहे कहो पान परवाना । नरियर भेद कहो सहिदाना ॥ कहाँ ते भयो पान परवाना । कहवाँ ते नरियर उत्पाना ॥

सतगुरु वचन

अमर मूल सौं पान बनावा । बेली बीज नहीं निर्मावा ॥ हतो न बेल बीज तिहि ठाई । शब्द माहि बेली निर्माई ॥

( १९८ )

अमरमूल

उपजो तबै पान परवाना । जाते हंस होय निर्वाना ॥ नरियर आहि धर्मको माथा । सो मैं दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥ जीवके बदले नरियर दीन्हा । हंस छुड़ाय धर्म सो लीन्हा ॥ नारियर पान प्रसादकी जोरी । सार शब्द सो नरियर मोरी ॥ जिन नरियरको पाय प्रसादा । जन्म मरणका पाप नसादा ॥ जे जीव पायो पान प्रवाना । देह छोड़ सतलोक पयाना ॥ काल दगा तबही मिटजाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥ ऐसी भक्ति जीव जो करई । भक्ति बिना सो नहिं निस्तरई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ नरियर पान प्रसाद बतावा । ताकर भेद नाहिं हम पावा ॥ सोई भेद मोहे देहु बताई । जिह्ति मन संशय मिटजाई ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो सुजाना । नरियर भेद पान परवाना ॥ धर्मदास जब सेवा लाई । तबकी कथा कहौं समुझाई ॥ जब तुम सुनो धर्मकी आदी । तब मिटि है जिवकी बकवादी ॥ सेवा बसहि पुरुष तब भयऊ । तीन लोग भवसागर दयऊ ॥ मानसरोवर बैठक दीन्हा । कामिनि देख बहुत सुख कीन्हा ॥ धर्मराज कामिन कहँ ग्रासा । तबही पुरुष आप परकाशा ॥ तीनलोक जिव करौं अहारा । तबही भरि है उद्र तुम्हारा ॥ तीनलोक महाँ जीव जो होई । धर्मराय कहँ आवैं सोई ॥ ताते नरियर बदला दीन्हा । जीव छुड़ाय कालसौ लीन्हा ॥ भक्ति प्रवान कहेउ समुझाई । बिना भक्ति नहिं काल पराई ॥ नरियर पान शब्द है नौका । भक्ति प्रवान कहेउ तहाँ चौका ॥