भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1061, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1061

बोधसागर

( १९३ )

शब्द विदेह भयो उच्चार । तिहिं पीछे त्रैलोक पसारा ॥ शब्दहि नाम लोक है भाई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥ निःअक्षर की परिचय होई । तब सतलोक पहुँचे है सोई ॥ जीवत लोक बैठ पुन जाई । सार शब्द महाँ रहै समाई ॥ अमर शब्दकी होय चिन्हारी । अम्बू द्वीप ताही बैठारी ॥ अम्बू द्वीप लोक कर नामा । शोभा कहा कहौं निजधामा ॥ अवर्ण रूप वणों नहिं जाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥ षोडश भान हंस को रूपा । पुरुषहि महिमा अमृत अनूपा ॥ अमर शब्द सों प्राणी भयऊ । वही शब्द सों लोकहि गयऊ ॥ पान परवाना शब्द है सारा । एही मूल सों हंस उबारा ॥ अकह नाम अक्षर है भाई । तुम निःअक्षर रहौ समाई ॥ निःअक्षर को करै निवेरा । कहैं कबीर सोई जन मेरा ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

निःअक्षर गुरु मोहि बताई । जाते हंसलोकमें जाई ॥ लोक प्रतीति करौं मैं कैसे । कहो विचार चित आवै तैसे ॥ तुम प्रभु निर्गुण भास्व सुनावा । अब कहिये सर्गुण परभावा ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

धर्मदास तुम मतिके आगर । सार शब्द कहियो सुखसागर ॥ हंसा सज्जन परम सनेही । कहियो ताहि परम पद तेही ॥ धर्मदास सो शिष्य तुम्हारा । सार शब्दको कहो सम्हारा ॥ तुम्हरे वंश कहिये उपदेशा । ज्ञानी होय तेहि कहो संदेशा ॥

साखी-मूरख सों जिन खोलिहौ, कहै कबीर विचार । ज्ञानी सों न दुराइ हौ, सुनो सत्त मत सार ॥