कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( १९३ )
शब्द विदेह भयो उच्चार । तिहिं पीछे त्रैलोक पसारा ॥ शब्दहि नाम लोक है भाई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥ निःअक्षर की परिचय होई । तब सतलोक पहुँचे है सोई ॥ जीवत लोक बैठ पुन जाई । सार शब्द महाँ रहै समाई ॥ अमर शब्दकी होय चिन्हारी । अम्बू द्वीप ताही बैठारी ॥ अम्बू द्वीप लोक कर नामा । शोभा कहा कहौं निजधामा ॥ अवर्ण रूप वणों नहिं जाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥ षोडश भान हंस को रूपा । पुरुषहि महिमा अमृत अनूपा ॥ अमर शब्द सों प्राणी भयऊ । वही शब्द सों लोकहि गयऊ ॥ पान परवाना शब्द है सारा । एही मूल सों हंस उबारा ॥ अकह नाम अक्षर है भाई । तुम निःअक्षर रहौ समाई ॥ निःअक्षर को करै निवेरा । कहैं कबीर सोई जन मेरा ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
निःअक्षर गुरु मोहि बताई । जाते हंसलोकमें जाई ॥ लोक प्रतीति करौं मैं कैसे । कहो विचार चित आवै तैसे ॥ तुम प्रभु निर्गुण भास्व सुनावा । अब कहिये सर्गुण परभावा ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
धर्मदास तुम मतिके आगर । सार शब्द कहियो सुखसागर ॥ हंसा सज्जन परम सनेही । कहियो ताहि परम पद तेही ॥ धर्मदास सो शिष्य तुम्हारा । सार शब्दको कहो सम्हारा ॥ तुम्हरे वंश कहिये उपदेशा । ज्ञानी होय तेहि कहो संदेशा ॥
साखी-मूरख सों जिन खोलिहौ, कहै कबीर विचार । ज्ञानी सों न दुराइ हौ, सुनो सत्त मत सार ॥
( १९४ )
अमरमूल
चौपाई
ज्ञानी होय जे मतिके धीरा । तहीं समाय वस्तु गम्भीरा ॥ धर्मदास सुनियो चितलाई । लोक प्रचय अब देउँ बताई ॥ निर्णय नाम निःअक्षर सारा । सर्गुण सकल कीन्ह विस्तारा ॥ निर्गुण सर्गुण बूझे कोई । सार शब्दमें रहै समोई ॥ अमर मूलका करे विचारा । धर्मदास सो शिष्य हमारा ॥ और ग्रन्थ बहुत मैं भाखा । अमर मूलकी है सब शाखा ॥ शाखा पत्र सबै लपटाना । अमर मूल काहू नहि जाना ॥ अमर मूल धर्मनि सुन लेहू । यही संदेश हंसन कहि देहू ॥ यह संतन को मत है भाई । जातें आवागवन नशाई ॥ सोई जीव उतर है पारा । नातर बूड़ मुआ संसारा ॥
साखी-ज्ञानी होय सो मानहीं, बूझे शब्द हमार ।
कहे कबीर सो बाचि है, और सकल यमधार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
पावन भेद अब कहो बुझाई । तामहिं जक्त रह्यो अरुझाई ॥ नीर भेद मोहिं कहो विचारी । बन्दी छोड़ जाउं बलिहारी ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
नीर पवन का भास्में लेली । सुकृत घटमें करौ विवेका ॥ हम टकसार ग्रन्थ यक भाखा । नीर पवन ताही महाँ राखा ॥ एही माहिं रहे लिपटाई । नीर पवन महाँ रहे भुलाई ॥
साखी-नीर पवन की उत्पति, कहे कबीर विचार ।
जो निज शब्द समावदी, सोई हंस हमार ॥
चौपाई
सार शब्द मैं कीन्ह नवेरा । नहिं माने सो जमको चेरा ॥ गर्भ वास जन्म सो धरई । जो यह लेखा बाहर परई ॥
बोधसागर
( ११५ )
छत्तिस नीर पचासी पवना । तासों रची सकल ही भवना॥ यह हो भेद कालको दीन्हा । नाम जो एक गुप्त हम कीन्हा॥ नाम भेद जो पावे सांचा । सोई जीव काल सौ बांचा ॥
सारखी-सार शब्द जो जानही, सो जेहै भव गीत ।
नातो जमपुर जायँगे, कठिन काल विपरीत ॥
चौपाई
गोरख पवन साध मर गयऊ । नाम प्रचय अजहूँ नहिं भयऊ॥
ब्यास देव ज्योतिषहि विचारा । लगन सोधकर घरी सम्हारा ॥
नामहि सार चित्त नहिं दीन्हा । लभ मुहूरत सब गहि लीन्हा ॥
सारखी-लभ मुहूरत साधिया, कर्म का भीत बनाय ।
भर्म टरै सद्गुरु मिलै, तबहीं लोकहि जाय ॥
चौपाई
यहै भर्म तब छूटै भाई । सतगुरु शब्द गहे चित लाई॥
नाम पान मैं कहौं बिचारी । जातैं छूटै भर्म किबारी ॥
मोह नसे सत चौकी होई । तबहि नाम कहैं पावै सोई ॥
ताते पान प्रवाना भाखा । भक्ति ज्ञान ताकर है साखा ॥
बिना नाम नहिं उतरे पारा । कैसे साध कहावे सारा ॥
पढ़ पढ़ विद्या वेद पुराना । नाम विना नहिं होय प्रमाना॥
चारहि गुरु जक्तमहैं कीन्हा । तिनके हाथ मुक्ति हमदीन्हा ॥
वे हंसन कहे लोक पठावैं । भवसागर मंह बहुरि न आवैं ॥
सारखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड़ अश ।
मुक्ति राज मैं दीन्हऊँ, अटल ब्यालिसहि वंश॥
चौपाई
धर्मदास तुम मतके धीरा । तातैं दीन्ह मुक्ति कों वीरा ॥
तुमतैं जीव उतर है पारा । दीन्हा सौप जक्त को भारा ॥
राय बकेजी चतुर्भुज राजा । सहतेजी गुरु तहां बिराजा ॥
( १९६ )
अमरमूल
साखी-राय बंकेजी चतुर्भुज, सहते जी हैरान । येहि छुड़ाय हरेक हीं, शब्द देहिं पहिचान ॥
चौपाई
यही छुड़ाय काल सों हंसा । शब्दहि दै कर हैं निःशंसा ॥ तुम धर्मदास ब्यालिसहि वंशा । ये निज आंहि पुरुषके अंशा॥ इन कहिये सौप दीन्ह जिवभारा । सब जीवनको करे उबारा ॥ इनही छोड़ अन्त चित लावै । जन्म जन्म सो भटका खावै॥ वंश ब्यालिस तुम्हरे सारा । और सकल सब छूठ पसारा ॥
साखी-नाम भेद जो जानही, सोई वंश हमार ।
नातर दुनियां बहुत ही, बूढ़ सुआ संसार ॥
चौपाई
धर्मदास मैं कहों बिचारी । यह विधि निबहै यह संसारी॥ काल कठिन है बहुत अपारा । जिन यह सृष्टि कीन्ह संहारा॥ ता कहैं कोइ न जाने भाई । कालहि सुमरण करहिं बनाई ॥ काल दुःख दे सबहि रुवावे । शब्द होय तहैं माथ नवावे ॥ नाम एक गुप्त है अमोला । सो धर्मनि मैं तुमसे खोला ॥ जो यह नाम को करे सम्हारा । सो भवसागर उतरे पारा ॥ तुम कहैं दीन्ह शब्द उपदेशा । सो हंसन कहैं कहौ सँदेशा ॥ ज्ञान प्रकाश जाहि घट होई । जीवन मुक्ति पावे जन सोई ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहैं सुनिय गुसाई । जीवन मुक्ति कहो ससुझाई ॥ जीवन मुक्ति कहौ किमि जाना । लोक वेद कैसे पहिचाना ॥ सो मोसां यह कहिये भेदा । जिहँतें मनकी संशय छेदा ॥
सदगुरु वचन-चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । वह निज भेद कहौ तुम पासू ॥ उग्र ज्ञान जाके घट होई । मुक्ति भेद कहैं पावै सोई ॥
बोधसागर
( १९७ )
अब मैं कहौं ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करौ प्रवेशा ॥ मुक्ति नाम निःसंशय होई । अमर नाम जब सुर्त समोई ॥ जहँलग कहि जिभ्या करगाया । तहँ लग जानौं सो सब माया ॥ अकह नाम कहा नहि जाई । घट २ व्याप्त निरंतर आई ॥ नाद शब्द जबहीं उच्चारा । तासौं अक्षर भयो बिस्तारा ॥ अक्षर हीते उपजी माया । संशय भई सबनकी काया ॥ तब ही शब्द सुर्त मन लाया । मन थिर भए नहीं है माया ॥ स्थिर घट मन लहर समानी । मुक्तिरूप तबही पहिचानी ॥ सो निःकर्म जीव हमारा । कर्म काट भव उत्तरे पारा ॥ जो यह गहै शब्द मन लाई । ताकर आवागमन नसाई ॥ सीखै पढ़ै काम नहि आवै । कर्म जीव मुक्ति नहि पावै ॥ ज्ञान प्रकाश जाहि घट होई । ताके हृदय मोह नहि कोई ॥ जैसे सूरज बादल हँधा । ऐसे मोह ज्ञान कहँ भँदा ॥ जब लग मोह न छूटे भाई । तबलग नाम न हृदय समाई ॥ जबलग मोह रहै तन बासा । तबलग नहीं ज्ञान प्रकाशा ॥ जन्म जन्म कर भक्त जो होई । तबहि नाम कहँ पावै सोई ॥ कोटिन जन्म भक्ति जिन कीन्हा । अमर मूल तबही पर चीन्हा ॥ अमर मूल कर पावे भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनती अनुसारी । सदगुरु वचन जाऊँ बलिहारी ॥ जिहि विधिममन होय अछेदा । सो समरथ कहि दीजे भेदा ॥ जो मोहे कहो पान परवाना । नरियर भेद कहो सहिदाना ॥ कहाँ ते भयो पान परवाना । कहवाँ ते नरियर उत्पाना ॥
सतगुरु वचन
अमर मूल सौं पान बनावा । बेली बीज नहीं निर्मावा ॥ हतो न बेल बीज तिहि ठाई । शब्द माहि बेली निर्माई ॥
( १९८ )
अमरमूल
उपजो तबै पान परवाना । जाते हंस होय निर्वाना ॥ नरियर आहि धर्मको माथा । सो मैं दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥ जीवके बदले नरियर दीन्हा । हंस छुड़ाय धर्म सो लीन्हा ॥ नारियर पान प्रसादकी जोरी । सार शब्द सो नरियर मोरी ॥ जिन नरियरको पाय प्रसादा । जन्म मरणका पाप नसादा ॥ जे जीव पायो पान प्रवाना । देह छोड़ सतलोक पयाना ॥ काल दगा तबही मिटजाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥ ऐसी भक्ति जीव जो करई । भक्ति बिना सो नहिं निस्तरई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ नरियर पान प्रसाद बतावा । ताकर भेद नाहिं हम पावा ॥ सोई भेद मोहे देहु बताई । जिह्ति मन संशय मिटजाई ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो सुजाना । नरियर भेद पान परवाना ॥ धर्मदास जब सेवा लाई । तबकी कथा कहौं समुझाई ॥ जब तुम सुनो धर्मकी आदी । तब मिटि है जिवकी बकवादी ॥ सेवा बसहि पुरुष तब भयऊ । तीन लोग भवसागर दयऊ ॥ मानसरोवर बैठक दीन्हा । कामिनि देख बहुत सुख कीन्हा ॥ धर्मराज कामिन कहँ ग्रासा । तबही पुरुष आप परकाशा ॥ तीनलोक जिव करौं अहारा । तबही भरि है उद्र तुम्हारा ॥ तीनलोक महाँ जीव जो होई । धर्मराय कहँ आवैं सोई ॥ ताते नरियर बदला दीन्हा । जीव छुड़ाय कालसौ लीन्हा ॥ भक्ति प्रवान कहेउ समुझाई । बिना भक्ति नहिं काल पराई ॥ नरियर पान शब्द है नौका । भक्ति प्रवान कहेउ तहाँ चौका ॥
बोधसागर
( १९९ )
भक्ति प्रवान कहौ समुझाई । कवन भक्ति सों जीव मुक्ताई ॥ तुम प्रभु हौ हंसनके नायक । पुरुष पुरातन जीवहित लायक ॥ भक्ति अँग मोहे देव बताई । तिहिं गहि हंसा लोक सिधाई ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास सुन भक्ति विचारा । जासों उत्तर जाय भव पारा ॥ प्रथमहि पान प्रवाना पावै । साधनकी सेवा मन लावै ॥ सार शब्द घट रहे समोई । अक्षर भेद पावै जन कोई ॥ अमर वस्तु गुप्त हम राखा । ज्ञानी होय तेहि सों भाखा ॥ शब्द रूप निःअक्षर जानो । सो हंसा सत लोक पयानो ॥ इतना ज्ञान जाहि घट होई । अमर मूलको जाने सोई ॥
छन्द-ज्ञान पूरन होय जा घट पान नरिअर भक्ति हो । बिन ज्ञान नहिं भेद पावैं केते पद गुण शक्ति हो ॥ अमरमूल यह ग्रन्थ धर्मनि सुनियो चित्त लगायकै । जन्म २ को पाप नासै अमरलोक सिधायकै ॥
सोरठा-सुन धर्मदास सुजान, किहिं विधि साधु कहावई । कहैं कबीर बखान, अमरमूल जाने बिना ॥
इति श्रीअमरमूल ग्रन्थ प्रथम विश्राम
ज्ञान भक्ति वर्णन
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । जीवन मुक्ति सो मोहे बताई ॥ नाम अमोल तत्त्व अति भारी । दुविधा माहिं जीव संचारी ॥ यह संशय मोहे निसदिन व्यापे । हरहु बेग गुरु यह संतापे ॥
( २०० )
अमरमूल
तुम सतगुरु घर बैठे तारा । आवागमन मोरे निर्बारा ॥ मन अरु जीव भेद बतलाओ । अबजिनमोसन अन्तर लाओ ॥ समझो तबै जीव मुक्ताऊँ । वही डोर गहलोक पठाऊँ ॥
सद्गुरु वचन
पावन पचासी सकल पसारा । जीव पवनसों आहि निसारा ॥ ब्रह्म रूप सब माँहिँ समार्ई । सूक्ष्म रूप जीव दरसारई ॥ दसवां भाग राई कर जाना । आतम रूपी देह समाना ॥ अरु योगिनमें बरते भाऊ । मानस देहमें मुक्ति प्रभाऊ ॥ पांच तत्त्व दस इन्द्री संग । प्रकृति पचीस कहेउ प्रसंगा ॥ यह प्रमान मन करे बखाना । जीव ब्रह्मसों भये उत्पाना ॥ मन करता यह देह समाना । सूक्ष्म रूप नाहिँ पहिचाना ॥ अंक चीन्ह स्थिर होये सोई । ताकी आवागमन न होई ॥ ताकौ बरन भेद जब पावे । मुक्ति होय जग बहुरि न आवे ॥ चौरासी कब बन्धन छूटे । काल जंजाल ताहि नहिँ लूटे ॥ मुक्ति भेद कोइ बिरले जाना । काल फांस जग सब लपटाना ॥ अमर मूल है मुक्ति पसारा । ताकौ संतो करौ विचारा ॥ आतम ब्रह्म एक है भाई । परमातम मिल ब्रह्म कहाई ॥ ज्यों जलमधि सों लहरि उगाई । तिमि परमातम आतम आई ॥ जिमि किसान चिनगी संचारा । इमि जिव भयउ ब्रह्म विस्तारा ॥ जिमि कंचन आभूषण कीन्हा । ऐसे जीव ब्रह्म कहँ चीन्हा ॥ उमैं अंश दीपक इक फूटै । जीव ब्रह्म संग न छूटै ॥ जिमिरविज्योतिकिरणपरकाशा । ऐसे ब्रह्म कर मोहिँ जिवबासा ॥ यहि विधि ब्रह्म जीवहिँ गाई । समझे तबही एक होजाई ॥ शिव शक्ती एकहिँ मतकीन्हा । तारक भेदको बिरले चीन्हा ॥ जे जाना ते मुक्ति समाना । प्रेम भाव सद्गुरु पहिचाना ॥
बोधसागर
( २०१ )
सारखी-जिन जाना निज प्रेम कहैं, सोईं जन परवान । तासों कहिये सूरमा, कहैं कबीर बखान ॥ चौपाई
केवल ज्ञान पाय है सोईं । जिहि पर कृपा गुरुकी होई ॥ केवल ज्ञान प्रगट समझाऊँ । भिन्न २ कर तोहि लखाऊँ ॥ प्रथमहि सुनो ज्ञान कर भेदा । निर्माही होय हंस अछेदा ॥ सुर्तवंत अक्षर पहिचाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ सुखदाई सबही कहैं भावै । बाल रूप होय अग्नि बुझावै ॥ समदृष्टी एकहि कर जानै । भला बुरा कछु मन नहिं आनै ॥ हृदय पुनीत शुद्ध मन होई । पाखण्ड भर्म डार सब खोई ॥ ब्रह्म वियोग सदा अनुरागी । दसहूँ दिशा झूठ तिन त्यागी ॥ झूठ सकल जग देखौ जानी । जैसे अहै बुदबुदा पानी ॥ अस मति जाकर होय सुहाई । केवल ज्ञान ताहि समुझाई ॥ माया बिना मोह नहिं आवै । नाम पदारथ निश्चय ध्यावै ॥ यह विधि केवल ज्ञान कहावै । जो सुमिरत सतलोक सिधावै ॥ केवल काम निःअक्षर आई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥ निःअक्षर तो करै नवेरा । कहैं कबीर सोईं जन मेरा ॥ अमर मूल मैं बरन सुनाई । जिहिते हंसा लोक सिधाई ॥ शब्द भेद जाने जो कोई । सार शब्द मैं रहै समोई ॥ शब्द ज्ञानका लख जिन पाया । समदृष्टि सब माहिं समाया ॥ जेतक जीव देह धर आए । शब्दहिं सों ते सकल उपाए ॥ शब्द अखण्डा और सब खंडा । सार शब्द गरजे ब्रह्मंडा ॥ निःअक्षर की परिचय पावै । सत् लोक महाँ जाय समावै ॥
धर्मदास उवाच-छन्द
बिन्ती करै कर जोर धर्मन, सुनहु सत गुरु सार हो । सत्तलोक है कौन शोभा, तहाँ कौन व्योहार हो ॥
( २०२ )
अमरमूल
कवन रूप जो पुरुष रहहीं, कवन सुख हँसा करै । कामिनी किहि रूप राजै, तहाँ सुख विस्तार हो ॥
सोरठा-सो मोहे प्रगट सुनाव, दया करौ निज दास कहैं । बार बार बलि जाँव, अब जिन मोहि छिपावहु ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
कहैं कबीर सुनहु धर्मदासू । सतलोक को कहों प्रकासू ॥ है सतलोकहि अम्बर काया । एक रूप सबही त्रय माया ॥ षोडश भान हंस की कांती । अमर चीर पहिरे बहु भांती ॥ शोभा पुरुष कही नहिं जाई । कोटिन रवि इक रोम लजाई ॥ अमर लोक अमर है काया । अमर पुरुष जहां आप रहाया ॥ अमर पुरुष का पावै भेदा । कहै कबीर सों हंस अछेदा ॥ सतलोक सत शब्द पसारा । सत् नाम है हंस अधारा ॥ अमृत फल के भोजन करहीं । युगन २ की क्षुभ्या हरहीं ॥ पीवत सुधा भर्म मिट जाई । जन्म २ की तृषा बुझाई ॥ कामिनी रूप वरन उजियारा । चार भान की ज्योति पसारी ॥ शोभा बहुतक प्राण पियारी । प्रेम भाव सब हंस निहारी ॥ अनहित वचन बोल नहिं बानी । प्रेम भाव अमृत रसरानी ॥ शोभा बहुत जहां मन भावन । हंस कामिनी रंग बढावन ॥ अमृत नाम हृदयमें लावे । प्रेम भाव पुरुषहि मन भावे ॥ आशा बस मन कोऊ नाहीं । भयो प्रकाश शब्दके माहीं ॥ बूझे संत ज्ञानी जो होई । सतगुरु शब्द हृदय समाई ॥ है निहशब्द शब्द सौ कहेऊ । ज्ञानी सोई जो वह पद लहेऊ ॥ धर्मदास मैं तोहि सुझावा । सार शब्दका भेद बतावा ॥ सार शब्द का पावै भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥
बोधसागर
( २०३ )
सार शब्द निःअक्षर आहीं । गहै नाम तेहि संशय नहीं ॥ सार शब्द जो प्राणी पावै । सत्तलोक महि जाय समावै ॥
साखी—कहै कबीर विचार के, सुनहु साधु धर्मदास ।
अमरमूल निज शब्द है, ताकर अस परकास ॥
चौपाई
अमर मूल ग्रन्थ में सारा । बिना अमर नहिं हंस उबारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कर जोर निहोरा । स्वामी सुनिये बिनती मोरा ॥
कवन प्रसाद दरश हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥
कवन प्रसाद साधु कहलायऊ । कवन प्रसाद हंस गति पायऊ ॥
कवन प्रसाद ज्ञान हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥
कवन प्रसाद नाम हम पाया । कवन प्रसाद हम लोक सिधाया ॥
कवन प्रसाद सजन जन जानी । सो समुझाय कहो मोहि बानी ॥
सद्गुरु वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदास । यह सब भेद कहों परकास ॥
पुरुष दयातैं दर्शन पावा । कोटि भक्ति सत नाम समाया ॥
जब कीन्ही सतगुरु ने दया । नाम जान अमर भई काया ॥
सेवा कीन्ही साधु कहाए । लोक जायके हंस कहाए ॥
हेत दीप सज्जन जन जाना । कहैं कबीर भेद निर्वाना ॥
साखी—एक नामकी शोभा, कहैं लग कहों बखान ।
निःअक्षर जो जानि है, सोई सन्त सुजान ॥
चौपाई
सत सहिदानि तोहि समझाई । अमर मूल महि देखौ आई ॥
कोटि जन्मको पातक होई । नाम प्रताप जाय सब खोई ॥
नामहि गहैं सूरमा जानी । बिना नाम कायर सो मानी ॥
( २०४ )
अमरमूल
नाम बिना सबही बिधि हीना । नाम बिना है ज्ञान बिहीना ॥ नाम बिना सो मूरख कहिये । नाम बिना सो पापी लहिये ॥ नाम जान सोई गुण आगर । नाम जान पहुँच सुख-सागर ॥
छंद
नाम अमी अमोल अबिचल अंक वीरा पावही । तज कागकि चाल मरालपथ गह अमरलोक सिधावही ॥ जिमि सदन दीपक बिना नहिं मिटत है अँधियार हो । तिमि नाम विन सुनु दास धर्मनि नहीं घट उजियार हो ।
मोरठा-नाम अमोल अपार, अमर मूल मैं वर्णैऊ ।
करहि कर्म जर छार, कहै कबीर बिचार कर ॥
इति श्रीअमरमूल नाम लोकमहिमा वर्णन ।
द्वितीय विश्राम
धर्मदास वचन-चौपाई
बिन्ती इक मैं करों गुसाईं । जिहि तें मन की संशय जाईं ॥
अमरमूल का कहौं विचारा । जाते हंस उत्तर है पारा ॥
कौन भक्त सों हंस कहावा । कौन विधीसों पंथ चलावा ॥
सो मर्यादि देहु बतलाई । तुम प्रभु ही हंसन सुखदाईं ॥
सद्गुरु वचन
कहै कबीर सुन धर्मनि नागर । यहविधिहंस पहुँच सुख सागर ॥
प्रथम करै सतगुरु की सेवा । जाते मिटै काल कर भेवा ॥
महा प्रसाद प्रेम सो पावै । सेवा कर निज गुरुहि मनावै ॥
घट में राखे प्रेम अनंदा । चौरासी के छूटे फंदा ॥
गुरु साहिब एकहि कर जाने । सो हंसा सतलोक पयाने ॥
साधन सों एकहि मति रहई । दुबिधा भाव न कबहुँ करई ॥
गुरु साधु सेवा जिन कीन्ह। ताकहँ मुक्ति निकट हम दीन्ह। ॥
बोधसागर
( २०५ )
सारखी-गुरु संतनको जान कै, हृदय करै परतीत । कहे कबीर सो हंस है, चलि है भव जल जीत ॥
चौपाई
सतगुरु तहां आरती करहीं । सब तज जहां जाय पगु धरहीं ॥ चरणाश्रुत साधन को लीजै । मुख पूजाकर अचवन कीजै ॥ गुरुकी दया निरवरत रहई । निंदा रूप न कबहूँ करई ॥ निःअक्षर सुमिरौ चितलाई । जासों आवागवन नसाई ॥ निःअक्षर को निरैवे भावा । देह छोड़ सतलोक सिधावा ॥ गुरुके वचन सोचकर माना । नाम बिना मिथ्या जगजाना ॥ और न देख और नहिं पेखै । निस दिन पल २ नाम विवेखै ॥
सारखी-छूट पसारा देख जग, करनी देय बताय । एक नाम कहैं जानके, ता महीं रहै समाय ॥
चौपाई
कर्म भर्म की छोड़हि आशा । एक नाम सों कर विश्वासा ॥ कुलकी लब्धा भर्म नसावै । ऐसी रहिनी साधु कहावै ॥ यह विधिसों तुम पंथ चलाओ । जन्म जन्म को पाप नसावो ॥ वंश तुम्हार लोक कहैं जाई । नाम बिना बूड़ी दुनियाई ॥ नाम जान सो वंश तुम्हारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥ नाम पार नहिं वेदन पावा । नेति नेति कर सब गुहरावा ॥ आदि ब्रह्मको पार न पावे । पठ पठ पण्डित भर्म लगावे ॥ मुक्ति पंथ नहिं सुतै समावा । पठ गुन थकित पार नहिं पावा ॥ अंतकाल जम घेरै आई । तब विद्या कछु काम न आई ॥ विद्या पठ कीन्हा अभिमाना । अंतकाल होय नर्क निदाना ॥ वेद पुराण साख यह भाखा । नाम बिनाको जमसों राखा ॥ व्यास ब्रह्मकी अस्तुति कीन्हा । श्रीभागवत भाखनित लीन्हा ॥
( २०६ )
अमरमूल
काम रूपकर सबहि सुनावा । पंडित तासु मरम नहि पावा ॥ पुरन ब्रह्म नाहिं चित दीन्हा । काम रूप सबहीमहि लीन्हा ॥ बिन सदगुरु कोइ मरम न पावे । झूठ राह सबही लपटावे ॥ सतपुरुषको मरम न जाने । झूठहि धाय सांच कर माने ॥ झूठहि झूठ रहा लिपटाई । सतपुरुषको लखा न जाई ॥ अठारा पुराण ग्रन्थ बहु भाखा । तिनमहि सिरे भागवत राखा ॥ ब्रह्म महातम कहि समुझावैं । श्रीभागवत भक्त दृढावैं ॥ कृष्ण चरित्रसबकरहिबखाना । कृष्ण मरम काहू नहि जाना ॥ निर्गुन भक्ति नहीं चित दीन्हा । सर्गुण भक्ति सबहिगहिलीन्हा ॥ निर्गुन ब्रह्म मरम नहि जाना । शिव समाधिलगावहिं ध्याना ॥ विष्णु ध्यान कीन्हा मनमाहीं । अलख निरंजन देखैं छाहीं ॥ देखत छांहि मम्र मन भयञ्ज । निरंजन रूप विष्णु ह्वैगण्ड ॥ दैत्य देव कीन्हें उतपानी । कीन्हें दैत्य देवनकी हानी ॥ दैत्य मारिके देव छुडावा । ताते विष्णु सबन मन भावा ॥ गोपिन मिलकर रास पसारा । लीला एहि भक्त चित धारा ॥ ता लीला महि सृष्टि भुलानी । ब्रह्मादिक सबमुनि अरु ज्ञानी ॥ ज्ञान कथैं अरु जोति दृढावैं । जोति स्वरूप मर्म नहि पावैं ॥ जोति स्वरूप निरंजन राई । जिन यह सकल सृष्टि भर्माई ॥ सत पुरुष का मर्म न जाना । झूठ ज्ञान सबही लिपटाना ॥ सत्य पुरुष सतगुरु सों पावे । सत्य नाम महाँ जाय समावे ॥
साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, अमर मूलनिज जान ।
अमर शब्द जा घट बसे, पावै पद निर्वान ॥
चौपाई
सत्य महाँ पावहु बासा । विना अमरनहिंकालविनाशा ॥ पठ पठ मूरख ज्ञान विगारे । ज्ञान गम्य नहिं कोइ विचारे ॥
बोधसागर
( २०७ )
ज्ञान गम्य जाके घट होई । शब्द खोज करि है जन सोई ॥ ज्ञान गम्य नहीं मूरख पावे । सतगुरु मिले तो भेद बतावे ॥ सब संसार दूण्ड फिर आवै । ज्ञान बिना सब मूल गँवावे ॥
साखी—संत मिले संशय नसे, नहीं तो पच पच मरना । नाव मिली केवटनहिं, किसी बिधि पार उतरना ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास कहै सुनहु गुसाई । ज्ञान शब्द मोहे समुझाई ॥ ज्ञान रूप सतपुरुष प्रकाश । सत्य लोक महँ कीन्हौ वासा ॥ किहिबिधि समझ परैयह बानी । कहिये सदगुरु नाम निशानी ॥
सदगुरु वचन
ज्ञान स्वरूप पुरुषकर आही । ज्ञानहि रूप कबीर लखाही ॥ ज्ञान प्रकाश दीप सम जानौ । बिना ज्ञान बस झूठ बखानौ ॥ बिना ज्ञान घटमें अधियारा । ज्ञानबिना नहीं होय उबारा ॥ ज्ञान बिना अक्षर नहीं पाई । ज्ञान रूप अक्षर है भाई ॥ ज्ञान रूप पुरुष कर जानौ । एही वचन सत्य कर मानौ ॥ ज्ञान रूप निःअक्षर कहिये । अक्षर भेद ज्ञान सो लहिये ॥ निःअक्षर हो ज्ञानहि जानौ । अक्षर निःअक्षर पहिचानौ ॥ ज्ञान शब्द पुरुष कर अंशा । ज्ञान जान जन सोह मम वंशा ॥ बिना ज्ञान नहीं वंश कहावे । ज्ञान होय तब शब्दहि पावे ॥ सोई वंश सत शब्द समाना । शब्दहि हेत कथै निज ज्ञाना ॥
साखी—कहे कबीर विचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।
जो यह शब्दहि पाय है, करि है लोक निवास ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
बिनती करी धर्मनि कर जोरी । हे सम्रथ विनती यक मोरी ॥ जेहि तैं वंश शब्द कहँपावे । सत्य लोक कहँ सत्य सिधावे ॥ औ जीवन कहँ देहु दढाई । जाते जीव मुक्ति गति पाई ॥
( २०८ )
अमरमूल
अब मैं वंशका कहों विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥ आदि नाम आमोदिक शाखा । सोई शब्द वंश कहैं राखा ॥ साठ सभै बारह चौपाई । एही तत्त्व हंस घर जाई ॥ जब माली का भेदहि पावै । सत्य नाम में जाय समावै ॥ ऐसो भेद सुनौ धर्मदासू । जन्म जन्म की भेटत त्रासू ॥ सद्गुरु दया कर्म होय छीना । अमर होय नामहि लौ लीना ॥ संशय का मैं कहों ठिकाना । संशय काल घटमाहि समाना ॥ जबही पुरुष धर्म कहैं कीन्हा । तबही संशय उत्पन लीन्हा ॥ निः अक्षरकी परिचय पावै । संशय मिटे अमर घर जावै ॥ संशय को खंडित है ज्ञाना । ज्ञान हीन संशय लिपटाना ॥ संशय काल सबन कहैं खाई । निःसंशय हो नाम समाई ॥ संशय काल लखै नहि कोई । तातैं गण बिगोय बिगोई ॥ संशय नाम सुनौ धर्मदासू । एक नाम की राखहु आसू ॥ नाम छोड़ अन्तहि चित आनै । संशय तमहि पकर गहि तानै ॥ नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूढे सब हंसा ॥ सारखी-कहैं कबीर धर्मदाससों, संशय को विस्तार । एक नाम कहैं जानके, उतरहु भौ जल पार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी संशय उत्पानी । ज्ञान हीन सब जीवहि जानी ॥ विरला हंस होय अंकुरी । सो यह ज्ञान गहै निज मुरी ॥ ज्ञान लखे बिन मुक्ति न होई । तौ यह दुनियां जाय बिगोई ॥ नाम महातम भाख सुनावा । बिना नाम कोई पार न पावा ॥
सद्गुरु वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह निज भेद कहौ तुमपासू ॥ ज्ञान हीन प्रानी जो होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥
बोधसागर
( २०९ )
ता कहैं दीजै पान प्रवाना । निश्चय हंस होय निर्वाना ॥ और प्रतीत हीय मैं धरई । सो प्राणी भवसागर तरई ॥ पान पाय सत्यहि मुख भाखै । सदगुरु चरण हियेमें राखै ॥ सदगुरु केर निछावर करई । साधु चरण चितनिश्चय धरई ॥ तन मन धन संतन पर वारै । सतगुरु चरण हृदयमें धारै ॥ सुत नारी कर मोह न आवै । सबही त्याग चरण चित लावै ॥ चरण धोय चरणाभूत लीजै । सत्यलोक महाँ अमृत पीजै ॥
धर्मदास वचन
पुरुषरूप कर यह उपदेशा । नारी को अब कहौ सँदेशा ॥ नारी नाम सुक्ति किमि होई । ताके घट महाँ ज्ञान विगोई ॥
सदगुरु वचन
ताकर तोहि भेद समुझाऊँ । मनो कामना सकल मिटाऊँ ॥ नारी तरै सुनो धर्मदासू । कहैं कबीर नाम विश्वासू ॥ ज्ञान हीन नारी को रूपा । ताको मैं सब कहाँ स्वरूपा ॥ तन मन धन संतन पर वारै । संतनकी सेवा चित धारै ॥ साधन सौ जो अन्तर करई । धर्मरायके फंदा परई ॥ गुरुके चरण निछावर जाई । तन मन धन सब देय चढ़ाई ॥ गुरुकी सेवा निशिदिन करई । सो तिरिया भवसागर तरई ॥ ऐसी धरन धरै धर्मदासू । तबही मिटै कालकी फांसू ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिन्ती अनुसारि । हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी ॥ यही वचन प्रभु मोहि सुनाऊ । मोरे मन इक भर्म समाऊ ॥ नारी रूप सकल हम जाना । पुरुष रूप एकहि पहिचाना ॥ नारी कहिये सब संसारा । आदि ब्रह्म है पुरुष अपारा ॥ आदि पुरुषहमतुमकहँ चीन्हा । दूसर पुरुष कहाँ अब कीन्हा ॥
नं. ७ कबीरसागर - ८
( २१० )
अमरमूल
जो तुम कही सोई हम जानी । नारी रूप सुर्त पहिचानी ॥ दूसर नारि कहाँ है कीन्हा । यही वचन हम संशय लीन्हा ॥ मैं नररूप आँहु मति हीना । यही भेद सुन भयउ मलीना ॥ तुम तौ दयावर्त गुरु स्वामी । क्षमिय चूक प्रभुअन्तरयामी ॥ नारी नाम मातु जो कहिये । इनहि भेद कैसे निर्वहिये ॥ नारी नाम बहिन जो आही । तासौँ कैसे अंक मिलाही ॥ नारी नाम पुत्री जो होई । तासौँ कैसे अंक सजोई ॥
साखी—यह सब भेद बतावहु, सुनहु हो बंदीछोर । यह संशय प्रभु मेटहु, चरण गहों प्रभु तोर ॥
सद्गुरु वचन—चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । यह संशय उपजी तुम पासू ॥ आदि पुरुष तब हते अकेला । शब्द स्वरूपी पंथ दुहेला ॥ तब साहिब ऐसा मत कीन्हा । सकल सृष्टिरचिबेचित दीन्हा ॥ मनसा घटते भिन्न निकारी । उत्पति भई तहाँ इक नारी ॥ सोई नारि सकल जग जाया । भग भोगे तैं पुरुष कहाया ॥ भग द्वारे होय बालक आया । यही भांति सब जग भर्माया ॥ मैं तो एक मतौ रच जबही । पुत्र, बंधु पिता भयो तबही ॥ मैं तो एक नारीकर जबही । पुत्रि, बहिन माता भई तबही ॥ भाई बहिन कीन्हा व्योहारा । धर्मराय को यह संसारा ॥ यह संशय महाँ मार लै जाई । मार जार सब दुनियां खाई ॥ आपहि पिता आपही पूता । आपहि देव आपही भूता ॥ आपहि नारि रूप औतरिया । आपहि सकल सृष्टि विस्तरिया ॥ आपहि कर्म धर्म उपजावन । आपहि रचै आप विनसावन ॥ तातैं भेदे बताऊँ तोही । ज्ञानी होय समझ कर लेही ॥ धर्मदास को संशय छूटा । जन्म जन्मके पातक टूटा ॥
बोधसागर
( २११ )
ज्ञानी सों कहिये उपदेशा । मूरख सों जिन कहौ संदेशा ॥ संशय कीन्ह सकल जग भंगा । काहु न चीन्हा संशय अंगा ॥
साखी-कहैं कबीर सो बाचि है, गुरु चरण चित दीन्ह ॥ अमर मूल निज शब्द है, हंसा चित गहि लीन्ह ॥
चौपाई
धर्मदास तुम करो विचारा । विना शब्द नहिं उत्तरौ पारा ॥ सार शब्द सों सब उपजावा । नारि पुरुष दोई निरमावा ॥ सूरज पुरुष चन्द्र है नारी । यह घटमें द्वै रूप सँवारी ॥ जैसे धातु कनककी एका । साँचा माही रूप अनेका ॥ पाप पुण्य रूपहि सों बांधी । कीन्ह धर्म यह अगम अगाधी ॥ पाप रू पुण्य भर्म है भाई । धर्म राय सब भर्म उपाई ॥ भर्म अमल तबही मिट जाई । सत्य नाम जब रहै समाई ॥ जब लग भर्म अमल है भाई । तब लग नाम बूझ नहिं जाई ॥ बूझ सीख गावै बहु भाँती । सुमरन भर्म करै दिनराती ॥ आप न चीन्हे मूढ़ गँवौरा । भर्मी भ्रम भूला संसारा ॥ धर्मदास तुम भर्महि छाड़ौ । निर्भय होय नाम चित माड़ौ ॥ जो तुम भर्म करो जो माहीं । तौ कस हंसन लोक कह जाहीं ॥ भर्म छोड़के भक्ति दढावहु । यह विधि हंसनलोक पठावहु ॥ तुम कहैं दीन्ह जक्तकी भारा । तुम्हरी मुहर चलै संसारा ॥ हाथ तुम्हार जीव सब तरहीं । भवसागर तैं हंस उबरहीं ॥ धर्मदास जग पारस देहू । जीव छुड़ाय काल सों लेहू ॥ पारस नाम कहेउ उपदेशा । मूरख सो जिन कहो संदेशा ॥
छन्द-ज्ञानी कहैं यह भेद धर्मनि देहु तुम समुझायकै ।
रहन गहन विवेक बानी कहहु सकल बुझायकै ॥
( २१२ )
अमरमूल
नाम पारस परस घट महाँ काग होय मराल हो । अमर लोकहिं बास कर तहाँ नाहिं काल कराल हो ॥ सोरठा-करलेहु आप समान, गुरुभृंगी यह जीव को । देखकर नाम निशान, रूप बरख पल्टायकै ॥ इति श्री अमरमूल ग्रंथ नाममहिमा वर्णन तृतीय विश्राम ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास उठ बिनती लाई । तुम पर ताप हंस मुक्ताई ॥ किहिंविधिपलटै जिवकी काया । सो समुझाय करौ मोहे दाया ॥ हो सतगुरु तुम अन्तर्यामी । पारस भेद कहो मोहे स्वामी ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
कहै कबीर सुन सन्त सुजाना । पारस भेद सुनाऊँ ज्ञाना ॥ ज्ञानी काहिं कहैं शब्द है सारा । यह पारस तैं हंस उबारा ॥ पारस पान बालक कहैं दीजे । तातैं हंस काल नहिं छीजे ॥ कामिनी कहैं पारस है सेवा । धर्मदास लखियो यह भेवा ॥ यही रहन तुम पंथ चलाओ । जीवन बोथ लोक पहुँचाओ ॥ तीनहु विधि यह कहै बुझाई । जो मानैं सो लोक सिधार्ई ॥ पुरुष होय शब्द नहिं जाना । निश्चय हुइहै नरक निदाना ॥ बालक हो वीरा नहिं पावै । कैसे कै वह लोक सिधावै ॥ कामिनि हो पारस नहिं लेही । गुरु सोई जो पारस देही ॥ कामिनि जो सो पारस लेही । कैसे मुक्ति होय पुनि तेही ॥ यासे गुरु जो अन्तर करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥ गुरु नहिं शिष कहैं ज्ञान बतावा । यद गुरुमें फिर धोख समावा ॥ शिष्य जो गुरुसों अन्तर राखा । शिष्यमहैं धोखा सत हम भाखा ॥ गुरु सोई जो शिष्य समुझावै । शिष्य सोई जो गुरु मन लावै ॥