भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १८३ )

साराअलम बना खयालोख्वाब । कोई नदेरी ना सारने कशबरआब

सारे जान्दार दे गुलाम तुम्हें ।

ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥

सारे जान्दारको फँसा मारा । नहीं इस जीवका रहा चारा ॥ करके तदबीर तुमसे सब हारा । जिन्दाकरकरके फिर फिर मारा॥

दे मुकद्दर बदस्त दाम तुम्हें ।

ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

तूही बखसिन्दा हैअपनो अमाँ । मातहत तेरे सब हैंजिसमो जाँ॥ तुझसे पैदा है वाणीवदो कुराँ । अबिदानो जादिदाने जमाँ ॥

याद करते हैं सुबहौं शाम तुम्हें ।

ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥

सारे मजहब जहाँमें जारी है । पीर सुरशिदकी राहदारी है ॥ अर्शफ़शोंकी सब तयारी है । आजिज इसरारसे सब आरी है॥ पेशवा भी किये इनाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सदसलाम तुम्हें॥

कर्मोंके चिह्नके विषयमें

कर्मोंके चिह्न जीवधारियोंके शरीरमें कालपुरुषने बनाया है इस जीवने जैसे कर्म पूर्वजन्ममें किये हैं वैसेही चिह्न उसकी देहमें बने हैं । सब जीवोंके शरीर पर चिन्ह होते हैं परन्तु मनुष्योंके शरीर पर भली भांति स्पष्ट प्रगट होते हैं इसी कारण मनुष्यकी देहहीसे इसके कर्मोंका भली प्रकार हिसाब किताब होता है । मनुष्यके शरीरके चिह्न देखनेसे भलाई बुराई जानी जाती है । जिस समय वीर्य स्त्रीके गर्भमें स्थिर होता है, उसी वीर्यके भीतर जीव होता है और उस जीवके साथ उसके पहलेके किये हुये कर्म