कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कर्मबोध
हैं। उसके भाग्यके अनुसार उसका शरीर प्रस्तुत होता है तथा समस्त रंग डीलडौल पूर्वकर्मानुसार ही होता है। जब वह माताके गर्भसे निकलता है तब उसके पूर्व जन्मके कर्मोंके चिन्ह उसके शरीरके ऊपर होते हैं। पांच वर्षके भीतर चिन्ह स्पष्ट प्रकट नहीं होते जैसे जैसे यह बड़ा होता जाता है वैसेही वैसे इसके पूर्व कर्मके चिन्ह दिखाई देते जाते हैं। तिल और मस्सा-इत्यादिभी पूर्वकर्मानुसारही प्रगट होते हैं और बहुतेरे चिन्ह छिपे रहते हैं। शिरसे लेकर पैरतक सुकर्म तथा दुष्कर्मके चिन्ह भरे हुये हैं। कहीं दुर्भाग्यके तो कहीं सौभाग्यके चिन्ह होते हैं। यदि एक स्थानपर दुर्भाग्य और दूसरे स्थानपर सौभाग्य एक ही बात पर चिन्ह होवे तब उसका मध्यम फल होता है। जो लोग सामुद्रिक जानते हैं उनको यह बात मालूम होती है। सामुद्रिक विद्या अत्यन्त कठिन है। जो सामुद्रिकमें प्रवीण हो वह मनुष्यका आकार देखकर सब कुछ कह सकता है।
कबीर साहबने इस सामुद्रिक विषयमें बहुत कुछ कहा है कर्मोंके चिन्ह देखकर सामुद्रिकका ज्ञाता सब कुछ कह सकता है उदाहरण युनान देशका महातत्त्वज्ञानी सुकरात (Socrates) एक पाठशालामें अपने शिष्यको पढ़ा रहा था उस पाठशालामें एक सामुद्रिक जाननेवाला आगया। जब सुकरातके शिष्योंने जान लिया कि यह पुरुष इस प्रकारकी विद्या रखता है, तब उनको वे अपने उस्तादके निकट ले गये और कहा कि, इस पुरुषके दोष और अवगुण कहो। वह सामुद्रिक जाननेवाला इस बातको नहीं जानता था कि वह हकीम सुकरात है। उस
१ देखो पुस्तक स्वास गुंजार।