भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( १५ )

प्यासा पानी नदी न पावै । जहैं पानी तहैं तृपा बुझावै ॥ इक जीव ग्रेही आप उवारा । वार नदी नहि सत कडिहारा ॥ बांधे अस्त्र करे शुग्माई । तिन के त्रास सौ दुर्जन डराई ॥ काछे रहै शूर का साजा । आयो समय कादर हो भाजा ॥ यहि विश्वास रहै जो कोई । स्वारथ पिंड परै जन सोई ॥ परै पिंड तब होवै हांसी । दै विश्वास जीव जो फांसी ॥ चतुरा पहिले करै उपाई । द्रव्य न मिले अनते नहि जाई ॥ धन मिले का यही उपाई । ग्रेही भाव रचो जो भाई ॥ क्षुधावंत जाके गृह आवै । भले बुगैके असन न जावै ॥ क्षुधावंत जो करही त्रासा । सन्तुष्ट होय तुरते हो पास ॥ औ जहां देखे सत् का वाना । ता कहैं बहुत करे सन्माना ॥ करै साधु सेवा मनराता । ता कहैं मैं बणों विख्याता ॥ जस जासूस द्रव्य नहि पावै । ताके नग्र सैध दै आवै ॥ चतुरा करै तामु सन्माना । जो पुन ताको करै वखना ॥ ताके पुर का मता बतावै । विवेककी महिमा द्रसावै ॥ ताके गेह दरब न चले जबही । ताकी महिमा दूत करे तबही ॥ बहुविधि महिमा करे जमदूता । तासौ कोई न करे अजगूता ॥ भाजै कादर नगर बधाई । ताके निकट जान नहि पाई ॥ धन्य सोई जो गेही करई । भल मन्दा को उदर भरई ॥ ता कहैं होई पुन्य परमारथ । नाम गहैं जन्मैं होय स्वारथ ॥ कडिहार सोइ जो शूरा होई । भाखों ताहि आपसम सोई ॥ सारखी-कडिहारा औ गृही को, कोई न जाने अन्त ॥ बिन परचै विसमाद है, हरषत परचै सन्त ॥

चौपाई

भाषो संयम सत के राऊ । अस गेही जो करै उपाऊ ॥ प्रात नेम जो करै अस्त्राना । प्रथम प्रफुल्लित कमल बिगसाना ॥