कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबांधसागर
( २३९ )
पिण्डा पार तर्पण करि दीन्हा । आपन मन अहंकार बड़ कीन्हा ॥ पित्र भक्ति कीन्ही ज्योनारा । मन मैं कीन्ह बहुत अहंकारा ॥ हम तो पित्र भक्ति लवलार्ई । हम सम भक्त और नहिं भाई ॥ हम सम नाहिं कोइ कुलीना । पित्र भक्ति बहुतक लवलीना ॥ जेवहि ब्राह्मण पुण्य बड़ होई । कुटुम समान और नहिं कोई ॥ वेद शास्त्र पढ़ ज्ञान जो जाना । भाषा ज्ञान सुने नहिं काना ॥ साधु संत जो द्वारे आई । तिनकहैं देखै बहुत रिसआई ॥ इन तो नष्ट कर्म बढ कीन्हा । मूढ़ मुड़ायकै टोपी दीन्हा ॥ जाति पांतिकी लज्जा त्यागी । निस दिन फिरहिं ब्रह्म अनुरागी ॥ ताते इन्हि न मानत कोई । पेटके कारण जाति बिगोई ॥ जाति समान न और बिचारा । जाते ब्राह्मण जाति सम्हारा ॥ यह सब मत ब्राह्मणने कीन्हा । जातैं सृष्टि कर्ममें दीन्हा ॥ जिन प्रभु रचा सकल संसारा । तिनहिं बिसार बूड अहंकारा ॥ प्रभुहि छोड़ अन्त चित बासी । जन्म अनेक फिरहिं चौरासी ॥ ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जानी । ब्रह्मरूप नाहिन पहिचानी ॥ मुनिवर स्मृति पढकै राता । ज्ञान हीन मिथ्या मद माता ॥ ब्राह्मण तो ऐसहि चलि गएऊ । ब्रह्म धर्म काहू नहिं गहेऊ ॥
साखी-ब्रह्म भेद जानैं नहीं, बहुत करै अभिमान । ताते ब्राह्मण बूड़हीं, कहैं कबीर बखान ॥
चौपाई
क्षत्री धर्म सुनौ व्यवहारा । गौ ब्राह्मण त्रियको रखवारा ॥ गाय मार दैत्यन सब खाई । क्षत्री धर्म सबै नस जाई ॥ ब्राह्मण से भरवावत पानी । क्षत्री धर्म कहाँ रहु जानी ॥ आनकी त्रिया आन घर जाई । द्रव्य आन को आन लुटाई ॥ न्यायहु पै ठाढा नहिं होई । क्षत्री धर्म सहज ही खोई ॥