कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बांधसागर
( २३९ )
पिण्डा पार तर्पण करि दीन्हा । आपन मन अहंकार बड़ कीन्हा ॥ पित्र भक्ति कीन्ही ज्योनारा । मन मैं कीन्ह बहुत अहंकारा ॥ हम तो पित्र भक्ति लवलार्ई । हम सम भक्त और नहिं भाई ॥ हम सम नाहिं कोइ कुलीना । पित्र भक्ति बहुतक लवलीना ॥ जेवहि ब्राह्मण पुण्य बड़ होई । कुटुम समान और नहिं कोई ॥ वेद शास्त्र पढ़ ज्ञान जो जाना । भाषा ज्ञान सुने नहिं काना ॥ साधु संत जो द्वारे आई । तिनकहैं देखै बहुत रिसआई ॥ इन तो नष्ट कर्म बढ कीन्हा । मूढ़ मुड़ायकै टोपी दीन्हा ॥ जाति पांतिकी लज्जा त्यागी । निस दिन फिरहिं ब्रह्म अनुरागी ॥ ताते इन्हि न मानत कोई । पेटके कारण जाति बिगोई ॥ जाति समान न और बिचारा । जाते ब्राह्मण जाति सम्हारा ॥ यह सब मत ब्राह्मणने कीन्हा । जातैं सृष्टि कर्ममें दीन्हा ॥ जिन प्रभु रचा सकल संसारा । तिनहिं बिसार बूड अहंकारा ॥ प्रभुहि छोड़ अन्त चित बासी । जन्म अनेक फिरहिं चौरासी ॥ ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जानी । ब्रह्मरूप नाहिन पहिचानी ॥ मुनिवर स्मृति पढकै राता । ज्ञान हीन मिथ्या मद माता ॥ ब्राह्मण तो ऐसहि चलि गएऊ । ब्रह्म धर्म काहू नहिं गहेऊ ॥
साखी-ब्रह्म भेद जानैं नहीं, बहुत करै अभिमान । ताते ब्राह्मण बूड़हीं, कहैं कबीर बखान ॥
चौपाई
क्षत्री धर्म सुनौ व्यवहारा । गौ ब्राह्मण त्रियको रखवारा ॥ गाय मार दैत्यन सब खाई । क्षत्री धर्म सबै नस जाई ॥ ब्राह्मण से भरवावत पानी । क्षत्री धर्म कहाँ रहु जानी ॥ आनकी त्रिया आन घर जाई । द्रव्य आन को आन लुटाई ॥ न्यायहु पै ठाढा नहिं होई । क्षत्री धर्म सहज ही खोई ॥
( २४० )
अमरमूल
धर्म न चल न गुरुकहँ मानै । अपने मन महाँ ज्ञान बखानै ॥ जो गुरु मिलै तौ ज्ञान लखावै । बहुरि न योनि संकट आवै ॥ एक नाम को करै नवेरा । चारों वर्ण तासु के चेरा ॥ एक धर्म कहँ बिनवै प्रानी । चार वर्ण साधन कहँ जानी ॥ साधुन की सेवा नहिं करई । बहु अभिमान हिये में धरई ॥
सारखी-भक्त रूप चीन्हत नहीं, चाल चले कहु आन । क्षत्री गण अभिमानमें कहैं कबीर निदान ॥
चौपाई
तातैं परसराम औतारा । उन क्षत्रिनको कीन्ह सँहारा ॥ बारन बूढ़न के भए काला । क्षत्री मार विप्र प्रतिपाला ॥ मूर्ख लोग सब करै बखाना । सत्यभक्ति परचित नहिं आना ॥ कोटिन हत्या क्षत्री करई । तिनकी लोग बढ़ाई धरई ॥ क्षत्री धर्म को होय निवाहा । तौ नहिं छोड़ै कालको चाहा ॥ धर्मराय तिन करै सँहारा । जारे वार करै जर छारा ॥ क्षत्री सोइ क्षमा जिहिं आवै । परजा दुखी आप दुख पावै ॥ वैश्य धर्म अब वेद बखानै । विष्णु जान मन और न कानै ॥ भूखा देख दया चित धरई । वैश्य धर्म व्यवहारहिं करई ॥ तीरथ व्रत करै विधि नाना । प्रभुकी भक्ति नहीं चित आना ॥ जेनी जीव करे प्रतिपाला । जैननामगत आहिं रिशाला ॥ पानी छान पिये दिन राती । नहिं ज्योनार करै निशिपांती ॥ हरिप्रतीत मन माहिन आनै । सूखे काठ सों मन चितठानै ॥ भक्ति रूप न्यारो धर्मदासू । जासों मिटै कालकी फांसू ॥ जीव श्वास ना धर्म चलावै । नाटक चेटक ज्ञान बतावै ॥ लिंग पूजावै घर घर जाई । कामिनि सों बहु प्रेम बढ़ाई ॥ कामिनी काम न चितसों छूटे । यहि विधि घर यम निशिदिन लूटे ॥
बाधसागर
( २४१ )
जप तप माया कीन्ह खुआरा । ऐसे जीव अटक यमद्वारा ॥ पारसनाथ पूजा मन लाई । बहुत भाँति सों पूजहि जाई ॥ पारसनाथ परम गुरु ज्ञानी । ताकी नहिं पावैं सहदानी ॥ ताके कर्म काट सब जाई । सतगुरु चरण रहै लवलार्ई ॥ जब सतगुरु की दाया होई । अक्षर भेद पाय नहिं सोई ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य बखाना । अक्षर भेद नहीं पहिचाना ॥
साखी—अक्षर भेद जानैं नहीं, करे बहुत अभिमान । वैश्य सबै वे नष्ट हैं, सत्य वचन परमान ॥
चौपाई
चार वर्णमें शूद्र अधीना । सेवा कर सबसों लवलीना ॥ इतनी भक्ति सतगुरु की पाई । चार वर्णमहैं सो अधिकाई ॥ ब्राह्मणकी सेवा अनुसारे । काम कोध औ लोभ निवारै ॥ क्षत्री सों बहु करै मितार्ई । नित नये प्रेमसहित अधिकाई ॥ वैश्य धर्मही विधि कर पूजे । सत्य धर्म दाया चित कीजे ॥ ऐसे शूद्रहि ब्रह्म बखाना । ब्रह्मलोक में सेवा माना ॥ कलियुग शूद्र धर्म अधिकारा । तीन धर्म को भयो सँहारा ॥ धन्य शूद्र जो सेवा करई । गुरुके चरण हृदय महैं धरई ॥
साखी—यह तौ करनी शूद्रकी, सुनियो हो धर्मदास । सतगुरुके चरण जो सेवई, सत्य लोक महैं वास ॥
चौपाई
धर्मदास तुम शूद्र औतारा । जाते सतगुरु भक्ति चित धारा ॥ तुम्हरे पीछे ब्राह्मण तरि हैं । तुम्हरे पीछे क्षत्रि उबरि हैं ॥ चारों वर्ण मुक्ति घर जैहैं । जो तुम्हरो चरणोदक लैहैं ॥ कबहैं न जल आवैं तेई । मुक्ति पदार्थ पावैं जेई ॥
नं. ७ कबीरसागर - ९
( २४२ )
अमरसूल
साखी—जो प्राणी जन्मत भये, शूद्र सकल संसार । कह कबीर जब बाचि हैं, करिहैं ब्रह्म विचार ॥
चौपाई
यह तुम सुनहु वर्णनका लेखा । मुक्ति भेद करहु विवेका ॥ तुम्हरे शिष्य शब्द जो पावैं । बिना शब्द नहिं शिष्य कहावैं ॥ शब्द भेद जो पावैं अंगा । ताको काल नहीं परसंगा ॥ बिन अक्षर सबकहैं दुख होई । येही विधि सब जाय बिगोई ॥ और सकल यमको द्वारा । तिनको धर्मराय जो मारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विन्ती कर जोरी । स्वामी सुनियो विनती मोरी ॥ तुम्ही दयाल हो अन्तर्यामी । करहु कृपा अब मोपर स्वामी ॥ तुम्हरे वचन मुक्ति हम पाई । हमरे वंश कस मुक्ति न आई ॥
सद्गुरु वचन
तब कबीर जो कहिबे लीन्हा । अब मैं कहौं वंशकर चीन्हा ॥ जिहि विधि मुक्ति होय रे भाई । सब अब तुम्हैं कहौं ससुझाई ॥ प्रथमहि विधि वंश ज्ञान मन लावै । सहज समाधि परम पद पावै ॥ निमोही हो जगसों रहई । मोह प्रीति मन हर्ष न करई ॥ जो मानै तौ अति भल जाना । नहिं मानै तौ समता ज्ञाना ॥ जो कोइ नाम कबीरहि लेही । तिनसो कछु न अन्तर देही ॥ आपा छोड़ नाम लव लावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥ जो मनमें करि है अहँकारा । निश्चय बूझै सब परिवारा ॥ सत्य भक्ति सत्यही मन लावै । आप तरे जीवन मुक्तावै ॥ जो कोई माया आन चढ़ाई । साधुन कहैं सब देय खवाई ॥ सत्य वचन सबही सों भाषै । सत्यनाम मनमें अभिलाषै ॥ कबहुँ न क्रोध कर मनमांही । जो बोले सो नामकी छांही ॥
बोधसागर
( २४३ )
ज्ञान विचारै शब्द सुनावै । सब जीवन कहैं लोक पठावै ॥ तुम्हरे वंश जो आगे होई । तिनके गर्व बहुत मन सोई ॥ गर्वके किये भक्ति नहिं होई । बिना भक्ति सब जाँय विगोई ॥ सात पिढ़ी लग गर्व गुमाना । आठै पिढ़ी भक्ति परवाना ॥ पावै सार शब्द परवाना । तब पुनि पावै लोक ठिकाना ॥ सात बाल जो तुम्हरे होई । तब लग रहै अभिमान समोई ॥ शब्द पेल कै करहिं धिगाई । पंथहिं मेट अपंथ चलाई ॥ आठे वंश तबै औतारा । तिनसों होय पन्थ उजियारा ॥ वे गुरु आय करै संसारा । तीन लोकमहैं बास पसारा ॥ स्वर्ग माहि नामी जिहि आही । धर्मराय तिनकी सुधि पाहीं ॥ तब अपना वह दूत पठाहीं । बहुतक छल करहै तिनपाहीं ॥ सार शब्द सों निकट न जाई । भागे दूत रहै पछताई ॥ वंश तुम्हार केर यह लेखा । बिना नाम नहिं होय विवेका ॥ जा कहैं अमर नाम मिलगयऊ । सो प्राणी निहसंशय भयऊ ॥ अमरशब्द जो घट परकाशा । तहैंवा है हमरौ निज वासा ॥
छन्द—जो अमरनाम न पाय है, सो अध है पछताय । जन्म जन्मत कष्ट बहुतक, जरा मरन समाय हो ॥ हंस वंशन हंस पंगत, कही सब दरसायके । यह रहन रहै सो लोक पहुँचै, कहै कबीर समझायके ॥
सोरठा—दीन्ह जकत को राज, धर्मन तुम्हरे वंश कहैं । करेहि जीव को काज, सत्यनाम समझायके ॥
इति श्रीग्रंथ अमरमूल चारवर्णवर्णन वंशमहिमावर्णन
( २४४ )
अमरमूल
सप्तमविश्राम
धर्मदास बचन चौपाई
धर्मदास कहे कर जोरी । स्वामी सुनये विन्ती मोरी ॥ जो तुम कही सोई परवाना । गुरुके वचन सत्य हम जाना ॥ हम जानी पुरुष रु गुरु माहीं । तुमहिं पुरुष कुछ अंतर नाही ॥ हमरे दिल यह पारख आई । तुम्हरी दया हंस मुक्ताई ॥ हमरे बालक तुम्हरे पाछे । तुम्हरी दया नाम मिल आछे ॥
सद्गुरु वचन
तब साहिब अस कहि समुझाई । वंश तुम्हार मुक्ति घर जाई ॥ जो कोइ बालक होय तुम्हारा । तिनसों भक्ति होय उजियारा ॥ पंथ माहिं जे बालक आवैं । ते तुम वंशन माथ नवावैं ॥ तिनसों भक्ति मर्यादा होई । सार शब्द चलि है निज सोई ॥ नाँद केरि बालक जो होई । तिनको मुक्ति नाम सो सोई ॥ नाँदके बालक शब्दहि जाना । भवसागर तज लोक पयाना ॥ विन्दके बाल रहैं अरुझाई । मान गुमान और प्रभुताई ॥ सत्य शब्द जिहि बालक जानी । सोई पावैं लोक सहिदानी ॥ जेहो बाल प्रवाना पावा । तिन कहैं जानहु वंश स्वभावा ॥
साखी-हमरे बालक नामके, और सकल सब झूठ ।
सत्य शब्द कहैं जानही, काल गहे नहिं खूंट ॥
चौपाई
धर्मदास सुन शब्द पसारा । बिना शब्द नहिं उतरहि पारा ॥ बिना शब्द तुम मुक्ति न पाओ । केतो ज्ञान गम्य फैलाओ ॥ वंश हमार शब्द निज जाना । बिना शब्द नहि वंशहि माना ॥ धर्मदास निर्मोह हिय गेहू । वंशकी चिन्ता छांड़ तुम देहू ॥ तुम तो भयऊ शब्द समाना । यही बचन तुम चित नहिं आना ॥
बोधसागर
( २४६ )
तुमहि कही अस बस्तु गुसाईं । मैं बूझों यह संशय जाईं ॥ तुम्हरी दया आज जो पाऊं । तौ सब बालक लोक पठाऊं ॥
सद्गुरु वचन
तब साहिब अस कहि समुझाईं । बिना नाम नहीं लोक पठाईं ॥ नाँद बिन्दकै बालक दोईं । बिना नाम कोई मुक्ति न होईं ॥ के तौ पढ़ै गुणै औ गावै । बिना नाम भव भटका खावै ॥ हमरे माया मोह न होईं । सब संसार सत्य कर सोईं ॥ धर्मदास तुम बड़े हो ज्ञानी । यह संशय कस मन मँहै आनी ॥ गुरु को भार सबन कर होईं । तुम मनमें पछताव न कोई ॥ तारन तरन सत्य हम सोईं । बिन सतगुरु बूझा सब कोई ॥ सतगुरु तौ सब सृष्टि उबारा । तुम बालक अब कौन है भारा ॥ तुम जिन चिन्तामन मँहै करहूँ । सद्गुरु नाम हृदय मँहै धरहूँ ॥ एक काल आवे जब भाईं । सबै सृष्टि यह लोक सिधाईं ॥ जहाँ लग जीव जन्तु सब कहिये । तहाँ लग सब सद्गुरु मँहै लहिये ॥ सबै भार सद्गुरुके काँधे । पार लगावहि यम नहीं बाँधे ॥ यमका अमल छूट जब जाईं । सद्गुरु शरण जीव जब आईं ॥
साखी—कहे कबीर बिचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।
अमरमूल जो जान है, ताको सब परकाश ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास बिनवै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिनती मोरी ॥ तुम्हरे कहे जगत तर जाईं । कौन मतासों लोक सिधाईं ॥ ज्ञान दिव्य जो घट नहीं होईं । सोइ कवन बिधि लोकसमोईं ॥ तब मैं जानो ज्ञान तुम्हारा । सकल सृष्टिको होय उबारा ॥
( २४६ )
अमरमूल
कहै कबीर तबै समुझाई । यह संशय तुम कवन कराई ॥ तुम तो आपन हंस उबारो । जीवन शोच कहा निर्धारी ॥ सतगुरु लीन्ह जगतको भारा । तेई करि है सृष्टि उबारा ॥ जापर गुरु चितवैं चितलाई । ताकर हंस बिगोय न जाई ॥ जब यह सृष्टि कीन्ह परकाशा । हंस अनंत सतलोक निवासा ॥ अबहुँ अनंत लोक कहैं जाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥ तुमको संशय कछु न भाई । आपन हंस करौ मुक्तार्ई ॥
साखी—सतगुरु तारनहार हैं, कहैं कबीर बिचार । तुम क्या शंका करत हो, आपन करौ उबार ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास विनवै कर जोरी । बिनती साहिब सुनिये मोरी ॥ तुम शिर आहि जत्तको भारा । सब जीवन को करौ उबारा ॥ हमको नाहिं गुरुवाई दीजे । आपन भार आप शिर लीजे ॥
सद्गुरु वचन
तब सतगुरु अस वचन उचारा । तुम कहैं दीन्ह जत्तको भारा ॥ तुम्हरे मुहर चले संसारा । अक्षर अक्षर करै पुकारा ॥ तुम्हरे कहे खोज जो करई । अक्षर पाय हंस निस्तरई ॥ जो नहिं मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहैं यमके द्वारा ॥ धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ तुम तो सत्य लोकके वासी । किहिं कारन आये अविनासी ॥ मृत्यु लोक मैं कवनै काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥ तहैंवां कवन काज पगुधारा । सो मोहिं स्वामी कहौ बिचारा ॥ तुम साहब सत पुरुष कहाए । मृत्यु लोक में काहे आए ॥
बोधसागर
( २४७ )
सद्गुरु वचन
तब साहिब बोले बिहसाई । अब यह ज्ञान सुनौ मन लाई॥ जब नहिं हते शून्य बे शून्या । तब नहिं हते पाप औ पुन्या॥ तब नहिं धरती गगन अकाशा । मेरे मन्दर नाहीं कैलाशा ॥ तब नहिं चन्द्र सूर्य औतारा । तब नहिं शेष सकलविस्तारा॥ तब नहिं इन्द्र कुबेर समोई । वायु वरुण तहैंवां नहिं कोई ॥ सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहिं कालकी छाहीं॥ तब नहिं ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि भवानी गौरि गणेशा॥ आदि पुरुष तब हते अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥ आप पुरुष अस कीन्हौ साजा । शब्दहि माहि लोक उपराजा॥ प्रथमहि शब्द सुरत अनुसारा । तेहि पीछे सब द्रौप सवौरा ॥ तेहि पीछे पुन मूल बनावा । तेहि पीछे सोहं उपजावा ॥ ता पीछे अचिन्त जो कीन्हा । ते पीछे अक्षर रच लीन्हा ॥ ता पीछे कूर्महि निर्मयऊ । ताहि भार पृथ्वीको दयऊ ॥ तब जल रंग सूरत इस भाखा । सप्त पातालके नीचे राखा ॥ जिह्वितै भयो जलको विस्तारा । सकल सृष्टि कौ भयो पसारा॥ तिहि तैं तेज तत्त्व अनुसार । जेहिं गुण तैं काल औतारा ॥ पांच तत्त्वतैं सब निर्मावा । तीनों गुण तिहि माहि समावा॥ तीनों गुण स्वरूपके धामा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा ॥ रज गुण तैं ब्रह्मा उत्पानी । सतगुरु भाव विष्णु कर जानी॥ तमगुण शिव संहार पसारा । इतने भयो सकल संसारा ॥ तेजके गुणहि काल उत्पानी । तासों भये जीव दुखदानी ॥ तातैं पुरुष दया चित आई । हंसन कारण मोहिं पठाई ॥ यातैं मृत्यु लोकहि आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥ तुम जीवनकैं बन्द बुझाये । सुमरन सत्य नाम समुझाये ॥
( २४८ )
अमरमूल
तुम्हरे हाथ सृष्टि तरजाई । सार शब्द हम तुम्हें लखाई ॥ या कारण संसारहिं आये । नाम पान सों हंस बचाये ॥ जो तुम कहौ कहा अस कीन्हा । आज्ञा मान पुरुषकी लीना ॥ पुरुष शब्द ते जीव उबारा । तुम कहैं कवन बात कर भारा ॥ यह चरित्र कछु कहा न जाई । अचरज खेल पुरुष निर्माई ॥ आपहि पुरुष आपही काला । आपहि काल कीन्ह बे हाला ॥ आपहि सकल सृष्टि निर्माई । आपहि न्याय करै सब कोई ॥ आपहि कर्म कुकर्म बखानै । आपहि आपन आप पहिचानै ॥ यही ज्ञान धर्मन सुन लेहू । इत उन चित जप मत देहू ॥ जिमि बालक मंदिरहिं सवोंरा । आपहि भेट आपहि हारा ॥ माता सों तब रुदन कराई । मंदिर अब मम देहु बनाई ॥ एही खेल बिधाता कीन्हा । यही मता कोई बिरिले चीन्हा ॥ धर्मदास तुम सत्यहिं मानौ । हमरौ बचन झूठ जिन जानौ ॥ यह चरित्र मैं तुम्हें सुनावा । लीला पुरुष केर समुझावा ॥ आपहि पुरुष आपहि नारी । आपहि काम विषय अधिकारी ॥ आपहि सृष्टि कीन्ह उतपानी । आपहि कर्म धर्म लपटानी ॥ कर्म भर्म आपहि उपजाई । आपहि स्तुति कीन्ह बड़ाई ॥ आपहि निंदक आपहि ज्ञानी । आपहि धर्म अधर्म बखानी ॥ आपहि अपनी स्तुति करई । आपहि मूर्ख चतुरता धरई ॥ आप कुलीन आपहि अकुलीना । आप धनाढ्य आपही दीना ॥ सतकुल आपहि असत बनाया । आपहि सत्य असत्य समाया ॥ यह तौ भेद पाय है सोई । सतगुरु मिले जाहि कहिं होई ॥ येही भेद धर्मनि लेव जानी । निर्मल जलगंगा सम मानी ॥ यहै ज्ञान मैं तुम्हें सुनावा । बिरला जन बूझै यह भावा ॥ यही बात गुप्त तुम राखहु । हमरी बात अंत जिन भाखहु ॥
बोधसागर
( २४९ )
जो कोई शब्दका खोजी होई । ता कहँ भेद बतावहु सोई ॥ इक मन इक चिन जाकर होई । ना कह ज्ञान न भापहु सोई ॥ दुतिया मन जाही कर भाई । तासों राखो भेद छिपाई ॥ जो गुरु सों कोई अन्तर राखा । धर्मराय सुगदर सोइ चाखा ॥
साखी-गुरुकी महिमा अगम है, अकह कही नहिं जाय ।
गुरु पद रज हियमें धरै, सत्यलोक कहँ जाय ॥
चौपाई
सत्यलोक सतगुरुकौ बासा । ब्रह्म कीन्ह गुरु मांहि निवासा ॥ गुरुके चरण रहै लवलार्ई । ताकी महिमा वर्णि न जाई ॥ गुरु औ शब्द एक कर जाना । ताकी त्रास धर्म भय माना ॥ जो कोई यह भेद न जानै । धर्मराय ता कहँ सन्मानै ॥ आतम ज्ञान जाहि कहँ होई । ताकौ काल न चापै कोई ॥ ऐसी धरण धरौ धर्मदासू । भवसागर तैं होउ उदासू ॥ सकल पसारा शून्य समाना । शून्यहि माहीं शब्द बखाना ॥ शून्य शिखरकी डोरी पावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनौ गुसाई । आतम ज्ञान गम्य नहिं पाई ॥ आतम ज्ञान मोहि समुझाऊ । जासों सकल हंस मुक्ताऊ ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास यह मता अपारा । ताकर जो मैं कहौ विचारा ॥ तब साहिब दया चितलाई । आतम ज्ञान तुम्हैं समुझाई ॥ गम्य अगम्य ज्ञान जब पावे । आतम ज्ञान तब घटहि समावे ॥ सत्य शब्द जब रहै समाई । सबही ठाम लोक है भाई ॥ शत्रु मित्र एकहि कर जाना । सांच झूठ एकहि कर माना ॥ सांच झूठ दोनों मिट गयऊ । दिव्य ज्ञान जाके घट भयऊ ॥
( २५० )
अमरमूल
आपहि गुरु आपही शिष्या । आपहि पाय आपही दिरुखा ॥ आपहि आप लगावे लेखा । आपहि न्यापे अगम अलेखा ॥ आपहि स्वर्ग नर्क भर्मावै । आप ज्ञानि हिय मुक्ति समावै ॥ आपहि दाता आपहि भुक्ता । आपहि अकृत आपही कृत्ता ॥ आपहि जन्म मरण उपजावै । आप मृत्यु है लोग रुवावै ॥ आपहि जिन्दा जग उपजावा । आपहि आशा तृष्णा लावा ॥ आपहि आप धर्म है काला । दोहू दीन ज्ञान तब चाला ॥ आपहि कुलअरु आपहि जाती । आपहि मूरत, आपहि पाती ॥ आपहि डाल आपही बेला । आपहि गुरु आपही चेला ॥
सार्वी-कहैं कबीर विचारके, आपहि सकल पसार । आप आप महँ रम रहै, आपहि सत्य अधार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहैं सुनौ गुसाई । यहै भेद तुम मोहि सुनाई ॥ ऐसा शब्द जो मोहि सुनावा । जन्म मरणकी त्रास मिटावा ॥ एक वचन मैं बूझौ साई । सोइ शब्द तुम मोहि सुनाई ॥ तुम जो कहेऊ ब्रह्म समाना । जीवरूप किमि होय अज्ञाना ॥ कबहुँ अज्ञान रूप है बतैं । ज्ञानी होय ज्ञान पुनि कतैं ॥ कबहुँ कहै यह ब्रह्म समाना । कहूँ राजा कहूँ भिक्षुक जाना ॥ कबहुँ जीव स्वभाव उपजावै । कबहुँ ब्रह्महो सबहि बुझावै ॥ ब्रह्म एक काहै अस कीन्हौ । साहिब मोहि बतावहु चीन्हौ ॥ कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह सब भेद कहौ तुम पासू ॥
सद्गुरु वचन
ब्रह्म रूप है बीज समाना । पारब्रह्म अंकुर प्रमाना ॥ ताही माहि पत्र दोय कीन्हा । एक शक्ति एके सब चीन्हा ॥ डार पात तब प्रकृति समाना । मूलवृक्ष ईश्वर सम जाना ॥
बोधसागर
( २५१ )
ता मई पांच डार निर्मावा । आकाशादि तेज उपजावा ॥ प्रथमहि वायु रूप जो कीन्हा । वायुके मध्य तेज धर दीन्हा ॥ तेजके मध्य नीर निर्माया । जैसे बीजसे वृक्ष जमाया ॥ ऐसे उत्पति सबकी होई । धोकामें सब गये बिगोई ॥ सद्गुरु जा कहँ दाया कीन्हा । सकल भेद ते पावैं चीन्हा ॥ तत्त्व मांहि निहतत्त्व लखावै । हृद मांहि अनहृद कहँ पावै ॥ अनर्थ मेटके अर्थ बतावै । लघु दीरघ पूरा समझावै ॥ पूर्णज्ञान जाही घट होई । सतगुरु भेदको पावै सोई ॥ ब्रह्मज्ञान बिन मुक्ति न होई । कैसे संत कहावै सोई ॥ जाकी महिमा कही न जाई । ज्ञान गम्य तैं शब्दहि पाई ॥ शब्द सार निर्मोलक पावैं । सो हंसा सतलोक सिधावैं ॥
सारखी-सो पहुँचे सतलोक कहँ, काल मर्म नहि जान । ते हंसा अवरन भये, सत्यपुरुषके ध्यान ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहै सुनौ गुसाई । आप अपन पर सब बिसराई ॥ सतगुरु जापै दाया कीन्हा । तिन पायोनिजबिजको चीन्हा ॥ सूक्ष्म रूप परश जन आवै । लघुता विलै दीर्घ पद पावै ॥ लघुता मति प्रभु आवस कैसे । समझ परै घट कहिये तैसे ॥
सद्गुरु वचन
कहँ कबीर सुन सुकृती बानी । यह घट समझ लेहु सहिदानी ॥ सूक्ष्म रूप शब्द कर आही । सतगुरुमिलहिं लखावहिंताही ॥ सूरत नित जब शब्द समाना । अहंकार मन केर बिलाना ॥ दीन भाव गति तबही आई । सब घट आतम एक समाई ॥ पूर्ण ज्ञान जाहि घट होई । तब यह भेद पाय है सोई ॥ ज्ञानी महिमा एही जाना । सब घट आतम एक समाना ॥ सो हंसा सतलोक सिधावे । दुबिधा भाव सबै बिसरावे ॥
( २५२ )
अमरमूल
छन्द-भाव दूसर तजहु धर्मनि, एक ब्रह्म विचारकै । इमि जीव जगमें देखिये, जलबिन्दु लहर सम्हरकै ॥ परमात्मासों आत्मा, जिमि भानु किरण प्रकाश हो । उलट कर जब आप चीन्हें, भाव दूसर नाश हो ॥ सोरठा-जिमि तिल मध्ये तेल, कंचन औ आभूषणा ॥ जीव ब्रह्म इमि मेल, पुहुप मध्य जिमि बासना ॥ इति श्री अमरमूल आत्मज्ञान वर्णन
अष्टम विश्राम
धर्मदास वचन-चौपाई
अर्ज एक अब करौं गुसाई । कृपासिन्धु मोकहैं समुझाई ॥ जीव सीव कर भेद न जाना । कैसे ज्ञान करौ परवाना ॥ जीव सीव कर भेद बताओ । यहै ज्ञान मोकहैं समझाओ ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास सुनियो चितलाई । जीव सीव मैं कहौं बुझाई ॥ पांच तत्त्व गुण तीन सो साजा । ताजे सृष्टि कीन्ह उपराजा ॥ शुद्ध सतो गुण सीव कहावै । रज तम मिश्रित जीव बनावै ॥ सत रज तम तीनों सो न्यारा । पारब्रह्म सबही तैं पारा ॥ पारब्रह्म अस कीन्ह समाजा । त्रिगुण रूप करसृष्टि उपराजा ॥ उपजा सृष्टि गुणकी खानी । ताते जीव बुद्धि कर जानी ॥ रज तम सत्त्व एक है भाई । बिना ज्ञान भूली दुनियाई ॥ तत्त्व ज्ञान जाके घट होई । जीव सीव कहैं जाने सोई ॥ बिना तत्त्व जाने नहिं कोई । केतौ यत्न करे नर लोई ॥ भर्म भर्म भूला संसारा । आप न चीन्हाँ भूल संसारा ॥ सब अभिमान छूट जब जाई । ब्रह्म भेद कहैं पावै भाई ॥
बोधसागर
( २५३ )
ब्रह्म ज्ञान जाके घट होई । मरम पुरुष कहैं जाने सोई ॥ सत्य शब्दका मर्म जिन जाना । और सकल जग झूठ बखाना ॥ सबमें ब्रह्म रहौ भर पूरी । बाहर भीतर तत्त्व हजुरी ॥ दूजा काहु न देखै कोई । सत्य शब्द जाके घट होई ॥ जाको सद्गुरु दाया कीन्हा । सो पावेगा शब्दका चीन्हा ॥ अगम भेद लख पावै जोई । सतगुरु साँच और सब छोई ॥ सतगुरु महिमा ही लख पाई । सो सत लोक पहुँचि है जाई ॥ यहै ज्ञान धर्मन करहु सुन लेहू । सब कहैं सत्य शब्द कह देहू ॥ मिथ्या ज्ञान करहु उपदेशा । तो नहि पावहु लोक संदेशा ॥ जो तुम काज आपना चाहू । तौ जीवन कहैं सत्य लखाहूँ ॥ जो कोई शब्द सुनै तुम पासा । सोई करि है लोक निवासा ॥ जाके सत्य ज्ञान घट भयऊ । यारै प्रीति निज घर कहैं गयऊ ॥ अनमोलिक हीरा निज जाना । ताका मोल वही परमाना ॥ सोहैं सम निर्मौलक भयऊ । साहिब सेवकइक मिल गयऊ ॥ कञ्चन और आभूषण जाई । ऐसे ब्रह्म जीव मिलजाई ॥ दूजा भाव न एका रहिया । संशय मेट अमर पद लहिया ॥ अमर मूल अमर पद भई काया । अमर शब्द जिन हंसन पाया ॥ अमर शब्द सतगुरु सो पावै । बिन सतगुरु सब मूल गँवावै ॥ कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । ऐसा भेद करौ परकासू ॥ यहै भेद संसार सुनावहुँ । सब जीवन कहैं लोक लेजावहुँ ॥ तुम कहैं दीन्ह जत्त कडिहारी । तुम्हरी बाँह उतर भवपारी ॥ जा कहुँ तुम बकसो सहिदानी । सो कडिहार जत्त मुहैं जानी ॥ जापर दाया तुमने कीना । सोई जीव मुक्ति कहैं चीना ॥ मुक्ति भेद जब पावै प्राणी । सतगुरुनेक सदा उत्पानी ॥ रजगुण तमगुण त्याग कराई । सतगुण धर्महिं परसैं भाई ॥ सतगुण धर्म कर पावै भेदा । कहैं कबीर सोइ हंस अच्छेदा ॥
( २५४ )
अमरमूल
धर्मदास वचन
धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु मैं तुम बलिहारी ॥ सतगुण धर्म मोहि समुझाई । जिह्वितें मन संशय चलिजाई॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास चित केहु विचारी । सतगुरु धर्म कहौं निरवारी ॥ प्रथमहि भोजन सब परिहरही । रजगुण भोजन मध्यम करही॥ उत्तम तंड़ुल आन भरावै । बार छानकै तहां मँगावै ॥ उत्तम चौका दीन्ह बहुभांती । शब्द बोल मलकीन्हौं स्वाँती॥ दुग्ध खांड घृत असन करावा । तासौं कहिये सतगुण भावा॥ जितनी क्षुधा होय घट प्रानी । लेव अहार सोई अनुमानी ॥ शब्द बोले परसाद चढ़ावै । भाजी बनै तो अति मनभावै॥ भाजी नहीं तौ जलभर आना । गुरुकहैं देय अधिक सुखमाना ॥ ऊगुर लेय बहुत मन मानी । यह विधि कहिये सात्त्विक ज्ञानी॥ तीसर भाग अभ्यागत देई । तब प्रसाद पवित्र करलेई ॥ अभ्यागत नहिं आपही पावै । राजस धर्म नर्क कह जावै ॥ सतगुरु धर्म छूट जब जाई । राजस तामस आन समाई ॥ सतगुण धर्म करौं प्रतिपाला । निश्चय पावे लोक रसाला ॥ चैतन्य पुरुषमें जाय समाई । दुविधा भाव सबै मिट जाई॥ रजगुण तमगुण सतगुण कहिये । सब मिट जाय ज्ञान जो पड़ये सब कहैं भर्म भूत करडारा । झूठी बात भेट औटारा ॥ सबै ब्रह्म ना दूसरे कोई । दूजा भर्म मिट गये सोई ॥ वेद शास्त्र सब कहै बखानी । वचन बिलास कहैं सब ज्ञानी॥ छळ शास्त्र मिल झगरा कीन्हा । ब्रह्म रूप कारू नहिं चीन्हा ॥ चीन्हैं तौ जो दूसर होई । भर्म विवाद करें सब कोई ॥ एके ब्रह्म अखंडित कहई । खंडित ज्ञान महीं निसदिन रहई॥
बोधसागर
( २५५ )
ताकी बात कहत परवाना । झूठ न छोड़ै मूर्ख अज्ञाना ॥ मूरख किमि कर कहिये भाई । ब्रह्म सकलमें रहा समाई ॥ आपहि मूरख आपहि ज्ञानी । आप कथा सब कहै बखानी ॥ आपहि ऊँच नीच दिखलावै । ज्ञानी होय जगत समुझावै ॥ आपहि बूझ आपही नाहीं । आप आपमहैं सकल समाहीं ॥ आपहि सुत्रिन करे बनाई । जप तप ज्ञान आप ठहराई ॥ स्वर्ग नर्क सब आपहि बासा । बाजीगर है करे तमासा ॥ आप तमासा आप भुलाया । आपहि हैं सब माहि समाया ॥ आप आप को चीन्हे नाहीं । आपहि ज्ञानी आप समाहीं ॥
साखी-आप आपको चीन्हकै, आप ब्रह्म हो जाय । आप न चीन्है आप कहैं, परौ भर्म महैं जाय ॥
चौपाई
अकह कहन कहि नहिं जाई । आप अकथ हो कथा सुनाई ॥ आपहि मनका रूप बनाया । दूया होके जगत दिखाया ॥ ऐसा भाव विधाता कीन्हा । ताते कोइ न पावै कीन्हा ॥
साखी-आप आपको चीन्हकै, सब संशय मिटजाय । कहैं कबीर निर्दोष भये, ब्रह्म स्वरूप समाय ॥
चौपाई
जबहि ब्रह्मरूप कहैं जाना । तब संसार झूठ कर जाना ॥ कितहुँ न देखे दूजा नाऊ । सब घट ब्रह्म जो रहा समाऊ ॥ जाहि ज्ञान अनुभव परगासा । सकल कर्मको भयो तब नाशा ॥ कर्म धर्म जो दोउ मिटये । ना कहुँ गये ना कहूँ आये ॥ जैसा रहा तैसा है सोई । बीचको भर्म मेट सब खोई ॥ कर्म भर्म की छूटी आशा । एकै नाम करहु विश्वासा ॥ नाम छोड़कै और न जाने । तीरथ व्रत कछु मन नहिं आने ॥
( २५६ )
अमरमूल
आपहि तीर्थ आपहि देवा । आपहि आप लगावै सेवा ॥ आपहि मूरत पिंड बैधावै । आप जन्त्र है जन्तर लावै ॥ आपहि महिमा सबकी कीन्हा । आपहि निन्दक मिथ्या कीन्हा ॥ साखी-आप सकल जग व्यापिया, आपहि अलख अपार । आपहि जग उपजावही, आपहि दस औतार ॥
चौपाई
आपहि देव दैत्य संहारा । आप युद्ध कीन्ह असरारा ॥ आपहि महाभार्थ करवाया । पांडौको शुभ ज्ञान सुनाया ॥ आपहि कौरव पांडव भयऊ । आपहि होय सबनसौं कियऊ ॥ आपहि है अहंकार स्वरूपा । आपहि रय्यत आपहि भूपा ॥ आपहि चाकर हो सेवा लावा । आप पंडित हो वेद पढ़ावा ॥ आपहि भला बुरा अनुसारा । आप अमीर न्याव निर्बारा ॥ आप ले आवै आपहि खाई । आप अतीत आप सिवकाई ॥ आपहि न्याव आपहि बादा । आपहि तीता आपहि वादा ॥ आपहि खाटा मीठा भयऊ । आपहि सर्वस्वाद कर लयऊ ॥ आपहि लघु दीरघ हो देखा । आपहि दूर निकट हो लेखा ॥ आपहि सकलौ वेद पुराना । आपहि पोथी आप बखाना ॥ आपहि छऊ शास्त्र बनावा । वाद विवाद कर ज्ञान सुनावा ॥ आपहि जीत आपही हारा । आपहि तरे आपही तारा ॥
साखी-ऐसी महिमा ब्रह्मकी कहत कही नहिं जाय । जो कोइ यह मति समझ है, तेही ब्रह्म समय ॥
चौपाई
ब्रह्म अखण्ड खण्ड नहिं होई । खंडित ब्रह्म ध्यावे सब कोई ॥ आप कहैं है ब्रह्म अखंडा । आपहि खंडित कह सबखंडा ॥ आपहि मनुष्य रूप कहावै । आपहि दूजा भाव स्वभावै ॥
बोधसागर
( २५७ )
आप अवचन वचन नहीं आवै । आप वचन कहि सब समुझावै॥ आप अरूप रूप नहीं कोई । आपहि सकल स्वरूप है सोई ॥ आपहि निर्गुण रूप जो कहिये । ज्ञानगम्यते यह मत लहिये ॥ आपहि ज्ञान मुक्तिके दाता । आपहि दाता आपहि मुक्ता ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । ऐसा ज्ञान घट करौ प्रकाशा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनती अनुसारी । हे साहिब मैं तुम बलिहारी ॥ यह मत मोहक अगम लखावा । हृदय कमल अब आन जुड़ावा ॥ एक बात मैं बूझहुँ सार्ई । सोइ कहौ जिहि संशय जाई ॥ तुम सब ब्रह्म कहो समुझावा । मोरे मन निश्चय यह आवा ॥ औरन सों कह कहौ गुसाई । यह तौ ज्ञान कहौं नहीं जाई ॥ मैं जाना सब तुम्हरी दाया । और जीव नहीं शब्द समाया ॥ ताकर मोहे कहौं उपदेशा । सो हंसन सों कहौं सन्देशा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम ज्ञान सुनाऊँ । जो मानैं सो सन्त स्वभाऊ ॥ जो नहीं माना शब्द तुम्हारा । फिर पछतै है बारम्बारा ॥ धर्मदास तुम आपन सोधौ । तब तुम सकल मृष्टिपर बोधौ ॥ जो तुम्हरी मन थिर नहीं होई । तब लग पंथ चलैं नहीं कोई ॥
सारखी—जब मन कहै परबोध हु, सकल भर्म मिटजाय ।
एक नाम कहै सेवहु, आवागमन मिटजाय ॥
चौपाई
धर्मदास मैं कहौं नवैरा । जासों हंस मुक्त होय तेरा ॥ मुक्ति होय सत नामहि पावै । बहुरि न योनी संकट आवै ॥
( २५८ )
अमरमूल
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनो गुसाईं । मुक्ति वस्तु सो मोहि सुनाईं ॥ तुम तौ मुक्ति भर्म कर डारा । तुमते पायँउ ज्ञान भंडारा ॥ मुक्ति करौ जो बन्धा होई । यह तौ हंस निबन्धक सोई ॥ नहिं कोई बन्धा नहिं कोइ छूटा । संशयके बस सब जग लूटा ॥ तुम्हरी दाय़ा सो हम जाना । मुक्ति अमुक्ति दोउ भर्माना ॥
सद्गुरु उवाच
अब तुम्हारे जिव निश्चय आई । हम जाना तुम सिखहौ भाई ॥ निज मन्त्रहि जानहु धर्मदासा । अब कह बूझहु सत्त विलासा ॥ जो कहिये सो वचन विलासा । यह तौ साखी पद परकासा ॥ ग्रन्थ कहेउ सब जगत प्रबोधा । जो बूझे सो पावै सोधा ॥ जो बूझे ग्रन्थनकी वानी । तब पावै गम निज सहिदानी ॥ जब पावै शब्दहि कर लेखा । तब जानहु जैसे सब धोखा ॥ धोखा योग यज्ञ तप कीन्हा । धोखा दान पुण्य सब लीन्हा ॥ धोखा कर्म करे संसारा । धोखा कोटिन ज्ञान पसारा ॥ धोखा पुरान सकल जहाना । धोखा शास्त्र वेद मत ठाना ॥ धोखा साखी पद है भाई । धोखा कह सब ज्ञान हुनाई ॥ धोखा प्रथम सांच कर माना । समझे धोखा सबै नसाना ॥ जस निर्गुण तस सर्गुण माना । निर्गुण सर्गुण एक समाना ॥ अगुण सगुण दोनों मिट गयऊ । आदिब्रह्म सौ परिचय भयऊ ॥ धर्मदास यह मति सुनि लेहू । धोखा ज्ञान चित्त मत देहू ॥ प्रथमहि भक्त रूपकर ज्ञाना । ता पीछे फिर तत्त्व समाना ॥ जबही तत्त्व समाना भाई । तबही जीव लोक कहैं जाई ॥ जबही सत्त्व हदैं महैं आवै । धोखा रूप सबै मिट जावै ॥ जब तुम अपना तत्त्वहि जानौ । गुरु औ शिष्य दोउ पहिचानौ ॥