भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १६ )

बोधसागर

ताकर सुत देवसि जो भयऊ । अपना सुतहि पढ़ाया लयऊ ॥ उन्ह लै सुत इक्ष्वाकुहि दीन्हा । प्रगट फिर काहू नहि कीन्हा ॥ यतिक दिवस जो रहेउ समाई । अब तुम कहैं मैं आनि सुनाई ॥ और ज्ञान यहि सम नहि होई । सुरति लौरति लै देखहु सोई ॥ तब अर्जुन पूछेउ अस बाता । तुम तौ भये यहि युग उतपाता ॥ सूर्य को आदि युग गयऊ । तुम सो गयउ उन्ह ज्ञान पयऊ ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु वचन प्रमाना । जो मैं तोहि सुनावों ज्ञाना ॥ मैं तो सदा रहों जगमाहीं । तुमहु रहौ हमारे पाहीं ॥ जन्म अनेक तेरो चलि गयऊ । जन्म अनेक मेगे पुनि भयऊ ॥ तैं अचेत माया में बंधा । मैं निर्मल जस पूरण चन्दा ॥ जन्म जन्म के गुण मैं जानौ । अपनो तेरो गुण पहिचानौ ॥ आदि अंत सकलौ मैं जानौ । ताते यतना भेद बखानौ ॥ तै है काम क्रोध अधिकारा । नहि बूझै तैं चरित हमारा ॥

अर्जुन उवाच

पुनि अर्जुन अस पूछन लयऊ । कारण कवन जन्म तुम धरेऊ ॥ निह इच्छा तुम अंतर््यामी । काहे आवागमन समानी ॥ तुम्हारे दुष्ट मित्र नहि कोई । कारण कवन जन्म धर लेई ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु परम पियारे । धरणी माँह पाप होइ भारे ॥ बहुत अधर्म होन जब लागे । वसुधा भार मही उठि लागे ॥ जब जब देखौं महि पर भारा । तब तब आनि लेउं अवतारा ॥ जन्म कर्म लै खेलौं जगमें । करि संहार जो रहौं अलग में ॥ मेरी गति मति कोइ न जानै । महिमा चारौ वेद बखानै ॥ होइ निष्कपट जो मोहक ध्यावै । महा अनंद परम निधि पावै ॥