कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( १७ )
जो मोसों कोइ अंतर राखै । कै २ दंभ भक्ति मन भाखै ॥ ता कई काल बहुत दुख देई । दंभी भार बहुत शिर लेई ॥ मैं हूँ तासों अंतर राखौं । कबही तासों निकट न भाखौं ॥ ताते तुम मोहक पहिचानौ । मेरो कहा सदा तुम मानौ ॥ तब अर्जुन बोले अस बानी । मर्म तुम्हार न काहू जानी ॥ करन करावन तुमही स्वामी । केहि कारण पृथ्वी अकुलानी ॥ तुम काहेको मारण आवौ । केहि कारण तुम भार चढ़ावौ ॥ तब अस बोले कृष्ण सुजाना । मर्म आपनो कहौं बखाना ॥ तीनि लोक जो राज हमारा । ताते रचौं खेले विस्तारा ॥ बहुत भांतिकै ख्याल बनावौं । खेलि ख्याल पुनि ताहि मिटावौं ॥ तीनि लोक मैं आवौं जावौं । निर्गुण सगुण जु नाम धरावौं ॥ जो जन भक्ति हमारी करई । मन वच कर्म मोहि चित धरई ॥ तेहि कह महु सहायक होऊँ । उन्हके दुष्टहि मारि बिगोऊँ ॥ सदा रहौं भक्तन हितकारी । तारण तरण है नाम सुरारी ॥ अर्जुन बहुरि जो पूछन लागे । इंद्री जीति सबै गुण त्यागे ॥ करन करावन कहवौ स्वामी । तुम पूरण हौ अंतर््यामी ॥ काहे सेवा पूजा लावै । देवि देवता बहुत मनावै ॥ देव पितरको पिण्ड जो भरई । केहि कारण बंधनमें परई ॥ तीरथ व्रत बहुतै तुम धावै । केहि कारण तुम नाम धरावै ॥ सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । मेरी मति गति विरले जानी ॥ जग रचना स्थिर नहि पावै । ब्रह्म अज्ञान विराग उठावै ॥ कोइ काहूकी शंक न मानै । आपु आपुमें ब्रह्म बखानै ॥ सब व्यवहार जगतके चाहौं । राज काजमें वोर निवाहौं ॥ तब यह कर्म दृढावौ आई । तौन सृष्टि तुम कस उरझाई ॥