कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
सद्गुरु संधि लखै को पारा । निराधार है अधर अधारा ॥
छन्द-गमि अगमि सद्गुरु लखायो निअक्षर सो पास है ।
कली फूलैं बास धावै ऐसो शब्द निवास है ॥
फूल तिल जब संग कीन्हों सुवस बासा तब भई ।
हंस बासा शब्द लीन्हो शब्द रूपी सो सही ॥
सोरठा-शब्द मता है सार, सुर नर सुनि जानैं नहीं ।
अंधा अध अचेत, अंधेरे न सुरति आने नहीं ॥
इति श्रीमदुभगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
कर्मसंन्यासग्याख्यानो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
श्रीकृष्ण उवाच
छठे अध्याय ध्याय है योगा । सुनु अर्जुन मैं कहौ संयोगा ॥
जब लगि ध्यान योग नहिं करई । तब लगि निर्मल चित नहिं करई ॥
ध्यान योग योग निजु साधै । मन वच कर्म नाम अवराधै ॥
मन संकल्प विकल्प न जाके । दीन वचन कठोर न ताके ॥
निस्तरंग कछु उठै न इच्छा । सबमें पारब्रह्म उत पेच्छा ॥
पांच पचीश न कबहूँ धावै । निशिबासर प्रभु संग रहावै ॥
पांचौ इंद्रिय लिप्त न होई । ऐसे साधु विरले कोई ॥
गृहस्त जीवन में बासा लेई । उत्तम ठौर कुटी कर देई ॥
मानुष तहां दृष्टि नहिं आवै । आसन उत्तम तहां बिछावै ॥
प्रथम धरणी पर धरे मृगछाला । तापर कुश साथरी रसाला ॥
तेहि पर बैठे हठ करि आसन । कैसो भांति न होइ उदासन ॥
खंभा सम आसब हठ आसन । सुरतिनिरति ले नाम संभारन ॥
जो यतने में आतम दरसइ । सो ज्ञानी प्रभु पूर्ण परसइ ॥
ऐसे जो कोई ध्यान लगावे । बहुरि योनि संकट ना आवे ॥