कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( २३ )
साधै निद्रा हार व्यवहारा । बहुत न मूदे नैन उघारा ॥ संयम कै सो साधन करई । सो साधू आपहि निस्तरई ॥ मन कह ज्ञान ध्यान में राखै । सुरति निरति सो अमृत चाखै ॥ जो मन अन्त न धावा चाहे । घेरि घेरि अभ्यन्तर बाहे ॥ तब अर्जुन अस पूछन लागे । यह मन चञ्चल पल पल भागे ॥ यह तौ काहू जाइ न पकरा । कौन उपाय जाइ मन जकरा ॥ गगन वाइ जो गर्जत आवै । कैसे गगरी माहि समावे ॥ यहि विधि मन चञ्चल यह भाई । तौ कैसे यह पकरन पाई ॥
श्रीभगवानुवाच
कृष्ण अर्जुन सो कहेउ बुझाई । ऐसे चञ्चल अस्थिर भाई ॥ जो यह मनको साधन करई । अभ्यन्तर लै फिरि २ धरई ॥ चारों दिशा चलन नहि पावै । जबै चलै तब माह समावे ॥ पारब्रह्म देखै तब नेता । दोई अनन्द परम सुख चैता ॥ दीन दुखित कह दाया करई । अपनासा दुख चितमें धरई ॥ दया भावसो हितकर बोले । तूस करै साधुन कह सो ले ॥ परका दुःख नेवारै सोई । ऐसी भक्ति परम गति होई ॥
अर्जुन उवाच
अर्जुन कहै सुनु कृष्ण सुरारी । तारण तरण भक्त हितकारी ॥ ऐसा साधु कोइ ना देखा । आपनसा दुख सब कहपेखा ॥ आपन सुख चाहे सब कोई । औरन दुःख होय सो होई ॥
श्रीभगवानुवाच
अर्जुन जो है परम सनेही । आप निकरि नहि जानहिदेही ॥ पर सुख कारण आपु निरासा । दुख सुख देखै सकल तमाशा ॥ भक्ति करै जो मन चित लाई । ताते परम पदहि में जाई ॥ निर्गुण साधु जो पूर्ण ज्ञानी । ताकी महिमा वेद बखानी ॥ वेद पुराण ते अधिक है सोई । ताकी पटतर वेद न होई ॥