भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २८ )

बोधसागर

ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । सब घट माही रह्यो समाई ॥ नहीं टण्टि देखन महाँ आवै । सकल सृष्टिके माहिँ रहावै ॥ रूप वरण कछु वरणि न जाई । कोटि सूर्य तेहि तेज समाई ॥ तिनका नाम सदा अविनाशी । रहै निरंतर अंतरबासी ॥ अक्षय है सब जक्त पसारा । व्यापक रूप रहा भरभारा ॥ तिनकी भक्ति करे जो कोई । आवागमन कबहुँ नहिँ होई ॥ अध्यात्म आत्म सो ज्ञानी । सबमें ऐकै ब्रह्म समानी ॥ कर्म नाम करता है सोई । दुख सुख कारण करता होई ॥ अद्भुत रूप सरूप है भाई । तेहि समान रूप नहिँ भाई ॥ कोटि सूर्यको तेज समाही । अर्द्धदेव सब देवन माही ॥ रहो समाइ जो सकलौ छाई । अर्द्धनाम सकलौ जग लेई ॥ व्यापक सदा सकलमें सोई । महा प्रलय जब आवै भाई ॥ लै सौ वर्ष अवधी रहई । रेनि दिवस छै मास जो होई ॥ दिवस एक देवन कर सोई । छः मास अवर जब जाई ॥ राति एक ताकर होइ भाई । ऐसे वर्ष दिवस नर होई ॥ दिवस एक देवनकर सोई । तासे मास वर्ष गनि लेई ॥ ऐसे वर्ष देवकर कहिया । अहनिशि एक ब्रह्म पुनि तहिया ॥ दिवस एक ब्रह्माकर होई । चारि पहर चारिउ युग सोई ॥ रातिउ ऐसे जान सुभाऊ । बरतै चारिउ युग पर भाऊ ॥ दिवस औ राति जब ऐसो जाई । पक्षमास पुनि वर्ष कहाई ॥ सात वर्ष ब्रह्मा पर वानी । काल आइ सो करै तब हानी ॥ ब्रह्म प्रलय जब आवइ भाई । रोमस रोम परै खहराई ॥ जब २ प्रलय काल जब आई । एक रोम रोमस गिरिजाई ॥ बहुत प्रलय ऐसे चलि गयऊ । आदि अंत काहुँ नहिँ पयऊ ॥ अष्ट अध्याय जो कहा बखानी । अक्षर ब्रह्म योग है ज्ञानी ॥