भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उग्रगीता

( २७ )

सद्गुरु चौथे लोक निवासा । मिलै अँकुरी जो निजदासा ॥ सार शब्द है तेहि पहुँचाऊँ । तीनि लोक बन्धन मुक्ताऊँ ॥ पावै सार शब्द निज बीरा । पहुँचै लोक जब छुटै शरीरा ॥ यमराजा तेहि निकट न आवै । चौरासी ते जीव छोडावै ॥ सार शब्द गहै निज डोरी । उतरे हंसा घाट करोरी ॥

छन्द-धर्म सेवा बहुत कीन्हो पुरुष दीन्हो राज हो ।

लोक तीनों राज पायो गर्वते अति गाज हो ॥

घाट अवघट सबै भूँदो कतहुँ नाहिं निकास हो ।

पुरुषते दुइ ठानिकै सब जीव राखो पास हो ॥

सोरठा-ऐसी युक्ति बनाई, पाप पुण्य फंदा रच्यो ।

चले लोक सो जाइ, सद्गुरु शब्द प्रताप जेहि ॥

इति श्रीमदुग्रगीताज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अथ अष्टमोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहै सुनौ प्रभु मेरे । मैं तो अधीन सदा हौं तेरे ॥

कहौ बखानि ब्रह्मको आही । सो निज भेद कहौ मोहि पाही ॥

अध्यातम तुम कहौ बुझाई । कर्म नाम काहैको रहाई ॥

अदभुत रूप बखानौ सोई । कछु मोसों जनि राखौ गोई ॥

अर्धनाम कहावै सोई । अर्धनाम जग काकर होई ॥

श्रीकृष्ण उवाच

कहैं कृष्ण सुनु अर्जुन भेदा । तुमसों कहौ मैं वेद निषेदा ॥

ब्रह्म सदा जो रहै अविनाशी । और स्मृष्टि सकलौ पुनि नाशी ॥

रहित नाम अविनाशी होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥