भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २६ )

बोधसागर

ज्ञानी सदा मोहि पहिचानै । मेरी भक्ति सदा सुख मानै ॥ ज्ञानी अधिक ताहिते होई । भक्ति हि हेतु अधिक है सोई ॥ अज्ञानी मोहि नर ही जानै । अलख रूप मोहि नहिं पहिचानै ॥ पूर्ण ज्ञान होइ जब भाई । तब ही निर्गुण अलख लखाई ॥ देवी देवा सब नर पूजै । तिनहींको करता करि बूझै ॥ उनकी प्रीति देव होइ जाऊं । उनकी मनकामना पुराऊं ॥ कोइ न बूझै ख्याल हमारा । रहउँ सृष्टि पुनि करें संघारा ॥ ज्ञान विज्ञान योग जो होई । सतवांध्याय सुनायो सोई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर जगकरता आही । धर्मदास तुम चीन्हौ ताही ॥ पुरुष तीन लोक यह दीन्हा । तीनिहुँ लोक राज इन कीन्हा ॥ सब जग माँहि कर यह राजू । मन इच्छा कर सबका काजू ॥ इनते मुक्ति कहौ कस होई । देखहु आतमज्ञान कैसोई ॥ इनते मुक्ति होइ जो साजा । देह धरावै कवने काजा ॥ धर्म अधर्म जीव अरुझाया । आवागमन महा दुख पाया ॥ आवागमन न छूटै भाई । तीनिलोक राखै लपटाई ॥ धरि अवतार जबै जग आवै । सकल सभा ऐसी हि भरमावै ॥ सृष्टि जहां लगि है संसारा । ऐसी भांति सब अवतारा ॥ काहू मुक्ति होइ नहिं भाई । राम कृष्णते को बड आही ॥ उनहू आवागमन न छूटै । धर्मराज फिरि २ जग लूटै ॥ धर्मराज यह खेल पसारा । औघट घाट मूँदि सब द्वारा ॥ तीन लोक ते जाने न पावै । स्वर्ग मृत्यु पाताल रहावै ॥ धर्म कर्म ते स्वर्ग हि जाई । धर्म घटे मृत्यु मंडल आई ॥ जैसे घरिया रहट सुभाऊ । ऊँचे नीचे फिरि २ आऊ ॥ बन्धनते छूटै नहिं पावै । ऐसे जीव सदा भरमावै ॥