कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( २६ )
जिन्है सतगुरु शब्द मिलिया अमी सो हंसा पिया । अजर अमर शरीर पायो बास सुख सागर लिया ॥ सोरठा-संत करो विवेक, शब्द सार गहु बूझिकै । सुरति निरति सो देख, सतगुरु शब्द अपार जो ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण उवाच
कृष्ण कहैं अर्जुन सुनि लीजै । भक्ति हमारी मन चित दीजै ॥ सतये अध्याय जो तुमसों कहउँ । भक्तनमें हितकारी रहउँ ॥ मैं ही करौं करावौं भाई । तीनि लोक जहँ लगि निर्माई ॥ मैं संधारौं मैं प्रतिपारौं । चौदह भुवन पलकमें टारौं ॥ जहँ लगि पशु पक्षी जिव होई । मैं सबही मैं रहौं समोई ॥ दानपुण्य आदिक सब माहीं । बनज व्यापार करै सब पाहीं ॥ देवी देव सकलौं मैं सब ही । भवसागर सकलौं जग हम ही ॥ तीनि लोकमें विजय मैं सारौं । जब चाहौं तब बेर संधारौं ॥ करौं संधार सृष्टि पुनि सोई । रहौं अलेप निरंजन होई ॥ सगुणते निर्गुण मैं होइ जाऊं । फिर चाहौं सगुण होइ जाऊं ॥ सगुण औ निर्गुण रूप हमारा । जहिंते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥ अर्जुन सबमें मोही जानो । कहा हमारा निजकै मानो ॥ चारि प्रकार भक्ति जो होई । तामें ज्ञानी अधिक सो होई ॥ रोग दुःखमें भक्ति जो करई । दुख कारण जो मोहि सुमिरई ॥ दीन दुखी निशिदिन लव लावै । कब प्रभु मोकहैं भोग भोगावै ॥ द्रव्य चहै जो द्रव्यहि स्वारथ । ज्ञानी चाहै मुक्ति पदारथ ॥