भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उग्रमाता

( ३६ )

अथ एकादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कृष्ण सो बिनती ठानी । हे स्वामी तुम अन्तर्यामी ॥ दश अध्याय तुम वरणि सुनायो। ज्ञान विज्ञान जो मोहि बतायो॥ सन्यासकर्म और वाक्य सुनायो। आतम संयम योग बातायो ॥ प्रवृत्ति निवृत्ति जो मारग भाषा । कर्म योग मन हट करि राखा ॥ यह सब सुनिनिर्मल भयो अंगा । अब मोहि दर्शन भयो उमंगा ॥ होउ दयाल विराट देखावौ । मति मोकहैं तुम दूरि बहावौ ॥ जो मोहिं शक्ति न देखत होई । तौ अब शक्ति दीजिये सोई ॥ तुम ठाकुर हौ अंतर्यामी । अब दर्शन बिन रहौं न स्वामी॥ अहो दयाल कृपा-निधि-सारग । दीनबंधु तुम पतित-उजागर ॥ तब हरि बोले चतुर सुजाना । इन नैनन्ह नहीं दर्शन जाना ॥ तुम तौ हौ निज भक्त हमारे । दर्शन तुम कह देउ पियारे ॥ यह सरूप काहू नहीं देखा । इंद्रादिक सुर नर सुनि शेषा ॥ सो दर्शन तुम देखा चैहौ । तीनि लोक हलकंप बढैहौ ॥ देखौ कालरूप जब मोरा । अर्जुन तुम तब रहौं न ठौरा ॥ डरपो बहुत होइ डर भारी । डरपै लोग सकल संसारी ॥ कहैं अर्जुन सुनु कृष्ण सुरारी । प्रथम देहु हटता मोहि भारी ॥ जो मैं डरौं दरसको करई । विनु मारेही मृतक होइ रहई ॥ सोई दृष्टि मोहि देव गुसाईं । जेहि दरशे परसौं तुम पाईं ॥ दिव्य दृष्टि अर्जुन कहैं दीन्हा । अर्जुन है मम दरश अधीना ॥ धारो रूप अकाश पताला । महा स्वरूप भयंकर काला ॥ माथ अनेक अनेकन्ह नयना । कर्ण अनेक बहुत मुख बयना ॥ नाक अनेक रू दंत अनेका । चितवत दृष्टि मारि है वेगा ॥ निकसि दाढ़ बाहे मुख भारी । तिन देखत जिव नाहिं सँभारी॥

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