भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

वदन अनेक भरे औ रीते । ऋषिसुनिवर तहाँ भये विपरीते॥ भुजधारी बहु बाहु विराजें । ऐसे कैसो दरशन राजें ॥ पाव पताल रहा जब जाई । शीश अकाश सातये भाई ॥ भूषण भांति २ के छाजें । मुकुट अनेक शीश पर राजें ॥ सूर्य चंद्रमा तहां रहाई । ऋषिसुनिवर तहाँ विनती लाई ॥ जहाँ लगि देवी देवता आहीं । सब देखो तिनके मुख माहीं ॥ अर्जुन देखि अचंभौ कीन्हा । अति डरि भये बहुत अधीना ॥ देवता ठाढ़े अस्तुति करहीं । भौ व्यापैं विलु मारे मरहीं ॥ किन्नर यक्ष गुणी सब ठाढ़े । कैंपैं सबैं देखिके गाढे ॥ राक्षस देखत भागे जाहीं । कोइ नेरे कोइ दूरि पराहीं ॥ कोइ जन अस्तुति करै मनुहारी । अब रक्षा प्रभु करौ हमारी ॥ कोइ एक जन दुरि परिहरहीं । कोइ जन निहुरी दंडवत करहीं॥ ऐसे स्फुट सकल जग देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥ औ मुख देखा बहुत भयावन । जानौ अब चाहत है खावन ॥ मुखमें तीन लोक जो देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥ जहाँ लगि साधु असाधु कहावै । सो सब ताके मुखमहँ आवै ॥ दुर्योधन देखा मुख माहीं । भीष्म द्रोणाचार्य जो आहीं ॥ योधा चले सबैं मुख माहीं । कौरौ पाण्डव उदर समाहीं ॥ कोस अड़तालिसकटक जोरहिया । सो सब मुखमें देखो तहिया॥ संसारी त्रैलोक पसारा । सो सब मुखके मध्य निहारा ॥ नदी आवै जस एकै धारा । सागर माहिं धसे सब खारा ॥ ऐसे जग सब उदर समावै । मुख माहीं सबही चलि आवै॥ जैसे जोत चांदना होई । जीव जन्तु सब लेइ समोई ॥ केतक डाढ़न माहीं अटके । केतक भागे फिरत जो भटके ॥ कोइ कतहुँ जाने नहीं पावै । बढ़ुरि २ मुख माहिं समावै ॥

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