भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उग्रगीता

( ३७ )

देखत अर्जुन बहुत डराये । मनमें धीरज नेक न आये ॥ विनय दंडवत करि बहु भाई । क्षमा करौ अब मोहिं यदुराई ॥ मोकहुँ सँभरन दे यदुराई । चित मेरो विभ्रम होइ आई ॥ तुम तौ पूरण पुरुष हो साई । रूप समेटो चित डेराई ॥ काल रूपते बहुत डेराऊँ । कृपा करो जिय मोर जुड़ाऊँ ॥

श्रीभगवानुवाच

कहैं कृष्ण अर्जुन सुनु वयना । डरपै जनि मूदो दोउ नयना ॥ तुम कारण यह भेष बनावा । और काहु देखो नहिं पावा ॥ तुम तौ क्षत्रिय बहुत पियारे । तुम कारण यह रूप सवॉरे ॥ अस्त्र लेहु तुम हाथ उठाई । इन कह मारौ बहु विधि भाई ॥ जो कोइ युद्ध करन कहैं आवै । राज धर्म तेहि मारि गिरावै ॥ इन सबको हम मारिजो राखो । सो सब देख्यो अपनी आंखों ॥ ए सब हमरे मुखके माहीं । तुम कहैं दूषण एकौ नाहीं ॥ तुम्हरे यश कह कारज कीन्हा । अब लगि राखा तुम्हरे लीन्हा ॥ आगे यही मृतक जो आहीं । तुम जग यश लेते कस नाहीं ॥ जगमें महा बाहु तुम होहु । अब तुम इन कहैं मारि विगोहु ॥ देखै युद्ध सकल संसारा । यश कीरति तब होइ उदारा ॥ अरजुन डरपत बिनती कीन्हा । तुम कर्ता मैं सदा अधीना ॥ अब लगि तुम कहैं मैं नहिं जाना । अब जो कहौ सोइ परमाना ॥ विनय करौ तुम सुनहु गोसाई । बहु अपराध भये मोहिं साई ॥ तुम संग सखा रूप हम डोलै । ऊँच नीच बोल जो बहु बोलै ॥ तुम तौ पिता सकल के होऊ । पालै मात पिता सुत सोऊ ॥ बालक लाख दोष जो करई । मनमें पिता रोष नहिं धरई ॥ तुम सो वैन कठिन मैं भाषा । सारथिकै अपने रथ राखा ॥ कछू चूक हमसे जो होई । सो अपराध क्षमा कर सोई ॥