कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( ४१ )
हम तो प्रेम प्रीति के भूखे । साधु संत कबही नहीं दूखे ॥ हमरी आज्ञा साधु जो धावै । महा पदार्थ मोक्ष सो पावै ॥ जो तुम सो कछु भक्ति न होई । मानहु मोर कहा निजु सोई ॥ क्षत्री धर्म न छोडिय भाई । एहिंते तुम पुनि पहुँचो जाई ॥ धनुष बाण तुम लेहु उठाई । युद्ध करहु तुम अर्जुन जाई ॥ मनमें मोह कछु नहिं कीजै । कारण करतामें चित दीजै ॥ जो तुम युद्ध जीतिकै आवौ । पदवी अटल परम पद पावौ ॥ द्वादश अध्याय भक्ति जो भाई । कृष्ण बखाना यह अध्याई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर धर्मनि हितकारी । भक्ति कहेउ जो कृष्ण सुरारी ॥ निर्गुण भक्ति सत्य है आदी । सगुण भक्तिहु जन्म न वादी ॥ पै हम अगम बखानी ऐसी । करै विवेक विचारै तैसी ॥ निर्गुण सगुण दोउ उर झेला । बूझेगा कोइ संत सुहेला ॥ क्षर अक्षर माया है भाई । निरअक्षर सद्गुरु समुझाई ॥ ताकर भेद न काहू पाया । मूरख धरि २ जन्म गवाया ॥ सद्गुरु शरण जीव जो आवै । काल फांसते जिव मुक्तावै ॥
छन्द-निर्गुण सगुण दोउ छांडौ संधि सद्गुरु चित धरो ।
सार शब्द अपार अविगति क्षर अक्षर निर अक्षरो ॥
भेद बूझो अगम गमि करि कछु न संशौ घट रहो ।
सोई हंसा अमी पीवै पुरुष को दर्शन लहो ।
सोरठा-सोइ भक्ति निज सार, जेहिंते पुरुषहि परशिहो ॥
बहु विधि कहौं पुकारि, भक्ति हीन दरशै नहीं ।
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे भक्ति-
योगन्याख्यानो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥