भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन सों बोले गोपाला । निर्मल ज्ञान सुनौ यहि काला॥ माया ब्रह्म सदा संयोगा । माया संग जीव पुनि भोगा ॥ तीनिउ गुण मायाते भयङ्ग । रजगुण तमगुण सतगुण भयङ्ग॥ रजगुण ब्रह्मा सृष्टि पसारा । सतगुणपोषण विष्णु विचारा॥ तमोगुण रुद्र सँघारै सोई । तीनिउ पुत्र माया के होई ॥ पृथ्वी तेज वायु आकाशा । जलमिली पांचउ तत्त्व प्रकाशा॥ दश इंद्री कीन्हो बंधाना । कर्म पांच २ है ज्ञाना ॥ मनबुद्धि चित अहंकार जो कीन्हा । इच्छा दोइ यक धीरज चीन्हा दुख सुख क्षेत्र जो कीन्हा माया । क्षेत्रज्ञ पुरुष अविगति समाया॥ क्षेत्र देह क्षेत्रज्ञ जिव होई । चेतन जीव अचेत समोई ॥ देह धरेते जिव दुख पावै । माया जड़ कछु शोक न आवै॥ आदि अनादि ब्रह्म औ माया । कारण सृष्टि धरे दुह भाया ॥ जैसे वृक्ष २ की छाया । वृक्ष विना छाया नहिं माया॥ ऐसे ब्रह्म सदा यक संगा । कारण सृष्टि रच्यो अर्थज्ञा ॥ अर्जुन व्यापक जीवहि जानो । अतो न न्यारो ब्रह्म पिछानो॥ जीवात्म माया भयो अंगा । परमात्म देखहु सब संगा ॥ पारब्रह्म सो लिप्त न होई । हाथ पांव इंद्री नहिं कोई ॥ सर्वेन्द्री जाके चहुँ ओरा । जहां तहां परकट सब ठौरा ॥ नैन चहुँ दिशि देखै सोई । कानन सर्व गुण सुने है जोई॥ मुख सकलौ जो खाय खवावै । पाव पवनते अधिक जो धावै॥ हाथ ऐसे जो रच संसारा । नासा सकल वास विस्तारा ॥ जो कहिये तौ सकलौ सोई । नाक होई तौ कछु न होई ॥ जाके कोई पुण्य न पापा । अलख रूप सो आपै आपा ॥