भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

दिवसहि लोक न सूझे भाई । सूर्य्यहि कैसे दूषण लाई ॥ ज्ञान अपार करउ परकाशा । जैसे सूरज जोति अकाशा ॥ चहुँदिशि जो उज्यारा आही । नैन विना अंधियारा ताही ॥ ज्ञान दृष्टि होई नहिं सूझे । सतगुरु मारग कैसे बूझे ॥

छन्द—ब्रह्म ज्ञान कहि २ सुनाव बहुरि आन कर्म सो । आपकोही स्थापि बहु विधि सब जीव राख भर्म सो॥ कर्म धर्महि भर्म त्यागै बूझि सतगुरु भेदको । अगम मारग वेदते जो बूझि वेद निषेद को ॥

सोरठा—ऐसो मतो अपार, वेद पार पावे नहीं । पुरुष शब्द नीनार, पुष्प बास जैसे रहे ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञनाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

बोले कृष्ण भक्त-हितकारी । अर्जुन सो अस वचन उचारी ॥ आगे बहुत ज्ञान समझाया । पै अब अगम करो तुम दाय्या ॥ जौन ज्ञान सुर नहिं पहिचानै । महिमा चारो वेद बखानै ॥ अब तुम हृदया धरउ छिपाई । ऐसों ज्ञान नहिं प्रकटै भाई ॥ प्रथम तत्त्व महि पुरुष सवारा । प्रकृति तत्त्व तेहिमें अनुसार ॥ कर्म बंध महि तत्त्वहि रहई । कर्म विधी बंधन सो कहई ॥ सब उत्पति महि तत्त्वते होई । प्रलय काल सब ताहि समोई ॥ आदि आनादिते महि चलिआई । काहू जाकी अन्त न पाई ॥ महि तत्त्व रूप ब्रह्मकी इच्छा । माया ब्रह्म समीप समीक्षा ॥ ताते तीनिउ गुण जो भयऊ । सतरज तमगुण उत्पन कियऊ ॥ ताके लक्षण करौ बखाना । तीनिउ व्यापक सकल जहाना ॥