भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उग्रगीता

( ४५ )

प्रथमै सतगुण सत्तै जानौ । शील लाज सन्तन हित मानौ ॥ प्रभुके सुमिरण रहै समाई । भक्ति भाव सन्तन सुख दाई ॥ शुचि संयम स्नान जो करई । जप तप दान पुण्य मन धरई ॥ निशिदिन चित रहै स्थिर भाई । सत्य संतोष जो सदा रहाई ॥ यह लक्षण सत्त्वगुण जो जाना । ताकी गति संक्षेप बखाना ॥ ऐसी भांति कांच जो होई । स्वर्ग लोक सुख मुक्तै सोई ॥ बहुत भाँति सो सदा अनन्दा । सत्त्वगुण विष्णुभाव गोविंदा ॥ रजोगुण ब्रह्मा भय उत्पानी । भूषण भोग सदा रुचि मानी ॥ बहुत भांति कै वस्तर भावै । घोडा हाथी रीझ बढ़ावै ॥ बहुत दामकै चाहै गाठी । बुद्धि फिरै भक्तन सो नाठी ॥ जहां तहां मैं मेरी बोले । सुख संपति कह धावा डोले ॥ सुखसंपति कछु काम न आवैं । हरिविन मूरख जन्म गवावैं ॥ यह लक्षण रजगुणके भाई । अन्तकाल मध्यम गति पाई ॥ तमोगुण रुद्र धरो जो देही । काम क्रोधके सदा सनेही ॥ निशिवासर रहै अहंलपटाना । आपन सम काहू नहि जाना ॥ क्रोधहि लिये करै सब कर्मा । भीतर रोख उपर तकै प्रेमा ॥ देवि देवता बहुत मनावैं । अन्त समय कोइ काम न आवैं ॥ आलस निद्रा वसै शरीरा । काहूकी नहि व्यापै पीरा ॥ तमोगुण लक्षण यह व्यवहारा । अन्त समय बहु करे पुकारा ॥ यमके दूत त्रास बड़ि देही । गति निकुष्टमें बासा लेही ॥ नर्क बासमें बासा लेई । योनि अघोर सदा भरमेई ॥ तीनों गुण बरतै सब अंगा । पलपल छिन छिन तीनों रंगा ॥ तीनों गुण रहै देह समाई । ता कारण भरमें सब भाई ॥ जिन साधुन गुण व्यापै नाहीं । सो तौ आवैं हमरे पाहीं ॥ तीनउ गुणते न्यारा खेले । ज्ञानेन्द्री लै मनहि सकेले ॥ ऐसा साधु मुक्ति गति पावै । आवागमनकी पीर मिटावै ॥

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