कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
अर्जुन उवाच
कहै अर्जुन तुम सुनहु भुवारा । गुण तीनों कस होइ निनारा ॥ करनी रहनिते साधु सो रहई । कैसे इनते न्यारा कहई ॥ इन बिन कर्म कछु नहिं होई । कैसे कै निष्कर्मो सोई ॥
श्रीकृष्ण उवाच
कहैं कृष्ण पूछेउ तुम नीका । मेटौ संशय सकलौ जीका ॥ तीनों गुण हैं नर्ककी खानी । पै सत्त्व गुणते नर उत्पानी ॥ ताते सत्त्वगुण अधिक महातम । करै भक्ति चीन्है परमातम ॥ जो सत्त्व गुणमें बास करई । इच्छा फल मनमें नहिं धरई ॥ दुख सुख दोऊ एक समाना । भला बुरा कछु मनहिं न आना ॥ मित्र शत्रु कोइ दृष्टि न आवै । सुत औ अरि दोउ एक सुभावै ॥ पाप पुण्य की करै न आसा । निशिवासर हरिचरण निवासा ॥ रहै उदास सदा जग माहीं । शीत उष्ण व्यापै नहिं ताहीं ॥ आनंद रूप सरूप है जाहीं । जगके सुख दुख व्यापै नाहीं ॥ देहीको आपन नहिं जानै । ब्रह्म रूप न्यारा पहिचानै ॥ सुत दाराकी कौन चलावैं । जगके बन्धन सब मुक्तावै ॥ ऐसी रहनि जो साधू होई । व्यापक गतिको पावै सोई ॥ यह तौ ज्ञान अगम मैं कहिया । अर्जुन राखो मन चितगहिया ॥ चतुर्दशाध्याय कहेउ जो कृष्णा । त्रिगुण विभाग कहेउ संपूर्णा ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनौ मम पासा । सत्य पुरुष चीन्हौ धर्मदासा ॥ जाते पुरुष प्रकृति जो भयऊ । माया ब्रह्म भाव दोउ ठयऊ ॥ महि तत्त्व कारण जग निर्माया । तीनिउ गुण पग तेहि भाया ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा । इनते जगत रच्यो सब सामा ॥ इनते पुनि अवतार अनेका । जन्म धरै युग युग फिरवैगा ॥