कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1188, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४८ )
बोधसागर
अर्जुन उवाच
अर्जुन पूछहि सुनु भगवाना । वृक्षके वर्णन करौ बखाना ॥ कहैं कृष्ण सुनु कुंतिकुमारा । वृक्ष शरीर रच्यो व्यवहारा ॥ ऊपर मूल तर डार बताऊँ । शाख पत्र सब तोहि सुनाऊँ ॥ मूल वृक्ष है पुरुष अगोचर । शाखा ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ॥ संसारी यहि गुणते आवैं । बृन्दबृन्द फिरि २ उपजावैं ॥ साधु सन्तको आतम ज्ञानी । प्रभु पूरणकी गति पहिचानी ॥ आवागमन तिन्हैं जो नाही । रहै समीप पुरुषके पाहीं ॥ कहैं अर्जुन तुम वृक्ष बखाना । सो तौ आवागमन समाना ॥ साधुको आवागमन न होई । कैसे वृक्ष न जायैं सोई ॥ अब तुम सुनौ हौ चतुर सुजाना । निर्मल तोहि सुनावौ ज्ञाना ॥ निष्कामी इच्छा नहीं जाहीं । असंग अस्त्र ले काटै ताहीं ॥ असंग अस्त्र सब वृक्षहि काटा । जरा मरणको छूटौ घाटा ॥ सोइ साधू मन चलन न पावैं । बाहेर जाते भीतर ल्यावैं ॥ जैसे पुहूष बास है भाई । पवन सरूपी लेइ समाई ॥ ऐसे इन्द्री जिव है बासा । मन दौरे इंद्रिन के पास ॥ इन्द्री साथ महा सुख मानै । अंतकाल रहु तेहि पछितानै ॥ इन्द्रिय वश जो मन नहि होई । पूरण ब्रह्ममें रहै समोई ॥ मन इन्द्री सो रहै निनारा । सोई पावैं मुक्ति के द्वारा ॥ ऐसा साधू कोई माई । कोटिन मध्ये एक रहाई ॥ अर्जुन कहैं परमपद कैसा । कहै कृष्ण सुनु अर्जुन ऐसा ॥ कोटिन सूर्य एक सम होई । कोटिन चन्द्र पूरण है सोई ॥ तबौ न बूजौ ब्रह्म उजियारा । परब्रह्म है अपरं पारा ॥ अर्जुन कहैं सुनो प्रभु मेरे । मैं आधीना दास हौं तेरे ॥