कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउग्रगीता
( ४९ )
जब नर नींद करै सुख सोवे । सुषुप्ति लिये मगन सो होवे॥ और जब प्रलय होइ संसारा । रहै लीन सब ब्रह्म मझारा ॥ ए गतिभक्ति ते मुक्ति कहावे । पै काहेते आवै जावे ॥ सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । भेद न जा नर अज्ञानी ॥ संशय लीन मगन होइ सोवै । ताते फिर २ संशय होवै ॥ प्रलय घात जिव ब्रह्म समाई । मनोकामनाते फिरि आई ॥ जैसे कामना होवै लीना । तैसे कामना होवै बीना ॥ ताते आवागमन न छूटै । फिरि २ जन्म योनि धरि लूटै॥ जो चीन्है अभ्यन्तर आतम । चेतन रूप चिन्है परमातम ॥ सबके अंतर मैं ही व्यापौ । करण करावन मैं ही आपौ ॥ जैसे तिलमें तेल रहाई । जैसे काष्ठमें अग्नि रहाई ॥ अग्नि रूप हो अन्न पचावौ । सब जीवनके मध्य रहावौ । ऐसे व्यापक मैं अभ्यन्तर । चारिउ भोजन करौं निरन्तर ॥ चारिउ भोजन सुनो सुजाना । जो मुखमें सब आनि समाना॥ भक्षणमें एक भोजन भाई । डाढते चाभि २ सो खाई ॥ दूसर भोजन कहावै सोई । पहित भात जो भोजन होई ॥ तीसर भोजन जो नाम कहावै । डाढ दांत ताहि नहिं पावै ॥ सीरा सिरखन कठी कहावै । बिना दांतन रसना लै जावे ॥ चौथा भोजन नाम जो कहिया । दांत लगाय रस चूसे जहिया॥ यह सब भोजन मैं ही करऊँ । उदर सकलबिधि मैं ही भरऊँ॥ ब्रह्मरूप अविनाशी मोरा । पूर्ण अंश आहि यहि थोरा ॥ क्षर अक्षर दोउ ब्रह्म स्वरूपा । क्षर बिन रहै अक्षर अनूपा ॥ अक्षर पारब्रह्म सो आही । दुख सुख कछु व्यापै नहिं ताही॥ ब्रह्मो निशि दिन खोजत रहई । ताकर वार पार नहिं लहई ॥ जैन यती संन्यासी ढूँढै । बहुत मुडावै बहुते चूढै ॥